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“मति-ज्ञान”

जैन धर्म में बताये हुवे “मति-ज्ञान”
को ही हम अच्छी तरह समझ लें,
तो जीवन में कभी भी “नुक्सान” या “गलत निर्णय”
लेने के कोई “संयोग” ही नहीं बैठेंगे.
 मेरे ही क्लाइंट (client) का एक जीवंत उदाहरण दे रहा हूँ:
एक भाई साहब की राजस्थान में एक जमीन है,
जो तीन साल से बिक नहीं रही.
जमीन का कब्ज़ा भी बड़ी मुश्किल से आया था.
 
चूँकि बार बार राजस्थान जाना पड़ रहा था, जमीन के सिलसिले में ही,
इसलिए उनके परिचित ने कहा क्यों ना “जमीन” में ही  “धंधा” शुरू  किया  जाए !
उन्हें बात जच गयी और उसमें काम शुरू किया.
 
इसी बीच राजस्थान में पुश्तैनी जमीन पर “मकान” बनवा लिया.
आज नतीजा ये है कि एक भी जमीन नहीं बिकी.
रिजल्ट :
सिर्फ धक्के,
पैसों की बर्बादी,
ऊपर से खुद का धंधा चौपट !
छानबीन करने पर पता पड़ा कि “पुश्तैनी” जमीन में वर्षों के झगड़े के बाद कोई हिस्सा मिला,
जो जमीन कब्जे में है (खरीदी भी है), उनमें से किसी भी प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री नहीं है,
अब “जमीन” का “धंधा” करेगा भी,
तो उस धंधे में “नफा” कर पाना तो एक स्वप्न ही है.
 
विश्लेषण:
१. बेचनी थी राजस्थान में “जमीन” और वहां पर “मकान” बनवाया.
२. खुद की जमीन तो बिक नहीं रही थी, दूसरों की लेने चले और बेचने भी.
३. “जमीन” सम्बन्धी “व्यवहारों” का “ज्ञान” भी नहीं था, फिर भी उसमें “धंधा” करने चले.
४. “पुरखों” की जमीन बेचने चले, बिना किसी आवश्यकता के.
(पैसों की आवश्यकता नहीं थी, तभी तो राजस्थान में मकान बनवाया).
और भी बहुत कुछ……अभी इतना काफी है.
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“मतिज्ञान” (बुद्धि) का “उपयोग” तब है जब उसे नित्य नया सीखने में लगाया जाए जिसे “श्रुत ज्ञान” कहते हैं
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