क्या बिना “मन” के “आत्मा” “कुछ” कर सकती है?

(पढ़ें jainmantras.com की एक अन्य पोस्ट – “मन” नहीं भटकता, आज तक “आत्मा” भटकी है)

आज तक “मन” को ही दोष ज्यादा दिया जाता रहा है.
“मन” के “ख़राब” पहलू पर ही ज्यादा बात की गयी है.
“ये स्थिर नहीं रहता,” ऐसा रोना बार बार रोया गया है.

 

मन को “स्थिर” करने के लिए बहुत “अभ्यास” करना पड़ता है.
ये बात तो हर किसी पर लागू होती है.

पर सोचने वाली बात ये है कि साइंस के स्टूडेंट्स अपने मन को किस प्रकार एकाग्र कर पाते हैं?
कैसे वो एक दिन में 12-14 घंटे पढ़ पाते हैं?
इतने क्लिष्ट विषयों में भी कैसे 98% मार्क्स भी ले आते हैं?

 

कारण?
बड़ी मुश्किल से “एडमिशन” जो मिलता है!
पेरेंट्स की गाँठ से लाखों रुपये खर्च होते हैं.
अब जहाँ इतने खर्च हो, तो स्टूडेंट्स तो क्या, घर का हर सदस्य भी “जाग्रत” रहेगा!
पैसे बेकार थोड़े ही करने हैं!

और इधर?
“धर्म क्रिया” कैसे की जाए, इसकी जानकारी “मुफ्त” में मिल जाती है.
“मुफ्त का चन्दन भी घिसें, तो उतना मजा नहीं आता,
जितना अपनी जेब से पैसे देकर भगवान की पूजा करें, तब आता है.
इसीलिए जैन धर्म में ये साफ़ कहा गया है कि देव-पूजा स्वयं के पैसे से करनी चाहिए.

 

अब आते हैं मूल विषय पर :

प्रतिक्रमण के समय पढ़ा जाने वाला एक सूत्र :

जावन्ति चेइआईं, उढढे अहे अ तिरि अ लोएअ |
सव्वाईं ताईं वन्दे, इह संतो तत्थ संताईं ||

ज्यादातर श्रावक एक ही सांस (उससे भी बहुत कम समय में) में ये सूत्र “धड़ाधड़” बोल लेते हैं.
मानो “एग्जाम” में “पेपर” छूट ना जाए. 🙂

 

इस सूत्र का अर्थ है:

उर्ध्वलोक, अधोलोक और तिरच्छालोक
(स्वर्ग, पाताल और इन दोनों के बीच के लोक यानि पृथ्वीलोक)
में जितने भी मंदिर हैं,
उन्हें मैं यहीं बैठा सबको नमस्कार करता हूँ.

 

क्या कभी हमें लगा कि हम एक ही “झटके” में इतने सारे तीर्थों को नमस्कार कर सकते हैं?
अरे! एक भी तीर्थ को कभी “नमस्कार” हुआ है ये सूत्र बोलते समय?
उत्तर:
हमने कभी चेष्टा ही नहीं की कि ये सूत्र क्यों बोलते हैं.
शायद पता भी नहीं है कि ये सूत्र बोला  भी जाता है  या नहीं.
(400 की स्पीड से जब “गाडी” भागती हो तो बीच में स्टेशन कौनसा आता है, ये थोड़ी पता रहता है, भले ही स्टेशन कितना ही बड़ा क्यों ना हो).
दूसरा कारण:
साल में प्रतिक्रमण करने का “मौका” ही कितना “कम” मिलता है!
“प्रतिक्रमण” तो करना पड़ता है क्योंकि पर्युषण में “कम से कम” इतना तो करें!
नतीजा:
जब इच्छा ही “कम से कम” करने की है तो फिर “ज्यादा से ज्यादा” लाभ कैसे मिलेगा?
विशेष:
एक बार वापस ऊपर लिखे सूत्र को पढ़ें और “फील” करें कि ये सूत्र बोलने के साथ ही “अरबों” (trillions) जिन-मंदिरों को मैंने नमस्कार कर लिया है.

और जानकारी के लिए अगले साल प्रकाशित होने वाली  jainmantras.com की पुस्तक पढ़ें:
“जैनों की समृद्धि के रहस्य”

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आदमी “शिक्षित” तब होता है जब उसका “मन” शिक्षित होता है.
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