भगवान महावीर !

वास्तव में तो भगवान महावीर का आज च्यवन कल्याणक है पर हर्षातिरेक में इसे “जन्म” के रूप में मनाया जाता है क्योंकि ये पर्युषण पर्व के बीच में आता है और उस समय भगवान का जीवन चरित्र पढ़ा जा रहा होता है.

हमारा सम्बन्ध भगवान महावीर सेपूर्व जन्म से है. 🙂

 

(कैसा रोमांच  होता है ये जान  कर, मन में कितनी प्रसन्नता होती है ये जान कर)!
यदि नहीं होता, तो जैन कुल में हमारा जन्म नहीं होता.
ना ही उनकी शिक्षा मिल पाती.
हम भी “मांसभक्षण” और “मदिरापान” कर रहे होते.
आज तो इस बारे में सोचते ही घृणा होती है.
कारण?
“बचपन” से “संस्कार” जो मिले हैं.

 

भगवान महावीर को केवल ज्ञान होने के बाद भी उपसर्ग आये.
साधनाकाल में मरणांतक कष्ट दिए गए.
पर “अहिंसा” और “करुणा” के पुजारी टस से मस नहीं हुवे.
बार बार “विध्न” आने पर भी किसी भी प्रकार विचलित नहीं हुवे.
हम भी भगवान महावीर की संतान हैं.
कैसे भी परिस्थिति क्यों ना आये,
हम नहीं डिगने वाले.

 

भले पंथवाद हो,
भले मान्यताओं का भेद हो,
भले वेश-भूषा में विभिन्नता हो (या वेश-भूषा ही ना हो),
भले “संत” मौन रहें या प्रवचन दें,
भले कोई “तप” करे या ना करे,
भले कोई हमारा अहित करे या करने की भी सोचे,
भले कोई मंदिर जाए या ना जाए,
भले कोई सामायिक करे या ना करे,
पर  सभी के “मन” में  भगवान महावीर के प्रति जो “आदर और अहोभाव” भाव है,
वो निश्चित रूप से “प्रशंसनीय” है.

 

सबसे आश्चर्यजनक तो ये है कि उनका लांछन “सिंह” है.
(लांछन वो चिन्ह है जो भगवान के जन्म के समय ईन्द्र उनके शरीर पर सबसे पहले देखते है,
वैसे तो 108 शुभ चिन्ह तीर्थंकरों के शरीर पर होते हैं).
नाम भी महावीर और काम भी महावीरों का!

सिहं बिना भूख के वो किसी भी जीव की “हिंसा” नहीं करता.
पर कभी कभी अपनी रक्षा के लिए आक्रमण भी करना पड़ता है.

 

आज कुछ प्राण करने होंगे कि
हम कुछ समय रोज “जैन धर्म” को समझने और उसका पालन करने के लिए निकालेंगे.
(अन्यथा हमें किस केटेगरी का गिना जाए, वो स्वयं ही विचार करें. )

१. धार्मिक शिक्षण की व्यवस्था हो सके तो ऐसे गाँव में की जाए जो सड़क से जुड़ा हो.
(जैन साधू गावों में चातुर्मास कर सकें, ऐसी व्यवस्था की जाए).
२. जैन स्कूल और कॉलेज हर शहर में खोले जाए.
3. व्यावसायिक कोर्सेज का महत्त्व हर गाँव तक पहुँचाया जाए.
४. कुछ कार्य सामाजिक उत्थान के किये जाएँ जिससे हर व्यक्ति “जैन धर्म” के प्रति अहोभाव रखे.
५. ज्यादातर ट्रस्ट, जो वास्तव में “कुछ” नहीं करते, उनका पुनर्गठन किया जाए.

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