किसी भी देव-देवी का सूत्र (SUTRA) सबसे छोटा होता है,
वही सबसे जल्दी प्रभावशाली होता है.
उदाहरण के तौर पर “जं किंचि” सूत्र को ही ले लें.
इस सूत्र को पढ़ने में मात्र 4-5  सेकंड ही हम लगाते हैं.

परन्तु इस सूत्र का “भावार्थ” जानेंगे तो
पूरी जिंदगी भी वैसा “कार्य” नहीं कर पाएंगे.

ऐसे क्या हैं इस सूत्र के भाव?

इसका उत्तर है:
“तीनों लोक में जो भी जिन-बिम्ब हैं,
उन सबको नमस्कार !”

विडम्बना ये है कि हमें “बड़ा” चाहिए
क्योंकि मन में ये “भ्रम” है कि “बड़ा” स्तोत्र (STOTRA) होगा
तो ही “बड़ा” रिजल्ट मिलेगा.
पढ़ने की “ताकत” भले ना हो.

हकीकत तो ये है कि ज्यादातर लोगों से
बड़ा स्तोत्र थोड़े दिन ही लगातार गिना जाता है.
बाद में समय की कमी के कारण
एक बार भी पढ़ना छूटने पर
वापस पढ़ना शुरू करने में बड़ा जोर लगाना पड़ता है.

कुछ लोग दादा-गुरु एकतीसा, भैरव चालीसा इत्यादि पढ़ते हैं.
जिसमें “काव्य” जरूर है, परन्तु “बीजाक्षरों” (BEEJAKSHAR) की कमी है.
इसलिए “कम” फलदायी होते हैं.
(भाव से पढ़ने पर फलदायी जरूर होते हैं,
परन्तु ज्यादातर जन इसे एक “आदत” के अनुसार ही पढ़ते हैं).

जो कम पढ़े लिखे हैं या मंत्रोच्चार सही तरीके से नहीं कर सकते,
उनके लिए ये “एकतीसा” और “चालीसा” अच्छा काम करता है.
किन्तु जो “मंत्रोच्चार” सही तरीके से कर सकते हैं,
उन्हें तो बीजाक्षर वाला ही मंत्रोच्चार करना चाहिए.
इससे उनका खुद का पावर भी बढ़ता है.