मंत्र उच्चारण में अशुद्धि

मंत्र उच्चारण में अशुद्धि

उच्चारण में सबसे ज्यादा अशुद्धि “ह्रीं” बीजाक्षर की होती है.
ज्यादातर साधू-साध्वीजी भी इसका उच्चारण सम्पूर्ण रूप से “शुद्ध” नहीं करते.
कई तो इसका उच्चारण “रीम्” करते हैं.

इसका सही उच्चारण
पूरे शरीर को झंकृत कर देता है.
बार बार जप करने से
ये पूरे शरीर में बिजली जैसी “सनसनाहट” पैदा करता है.

इस प्रक्रिया से
“आत्मा” पर जो “पाप” लिप्त हुआ है,
उसकी परतें “उखड़ने” लगती हैं.

ऐसा करने पर कुछ “कष्ट” और बढ़ते हैं,
परन्तु जिस प्रकार “सर्जरी” में “शरीर” को कुछ कष्ट पहुँचता है,
उसके बाद भी कुछ दिन “ध्यान” रखना पड़ता है
परन्तु वास्तव में तो “आराम” ही आता है.

सर्जरी तो कभी कभी “असफल” भी हो जाती है
परन्तु “शुद्ध” उच्चारण से किया हुआ “मंत्र-जप” कभी असफल नहीं होता.

एक उदाहरण और:

जिस प्रकार कपड़ों को “पीट पीट” कर उसका मैल निकाला जाता है
बस वैसे ही “ह्रीं” बीजाक्षर पाप कर्म को “पीट पीट” कर बाहर निकालता है.
परन्तु ये “पिटाई” तो पहले “कपडे” की ही होती है.
बस साधक को भी “शुद्ध” होने के लिए
उसी प्रकार की अपनी “पिटाई” के लिए “तैयार” होना पड़ता है.

नोट :
शुद्ध मंत्रोच्चार करने वाले की आवाज एकदम स्पष्ट होती है.
वो सूत्र भी “गण-गण” जैसी आवाज में नहीं बोलता.

उसकी वाणी में ओज होता है
और चेहरे पर भी ओज प्रकट होता है.
उसकी “उपस्थिति” ही “असम्भव” दिखने वाले कार्यों को “संभव” बन देती है.

कारण?
मंत्र-देवता अप्रकट रूप में उसकी सहायता करते हैं.

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