दिवाली पर मंत्र जप -1

१. दिवाली के दिन भगवान महावीर का निर्वाण हुआ. अमावस की रात को अँधेरा रहता है और मानो उस रात्रि ने जगत से धर्मचक्रवर्ती महावीर स्वामी के ( साक्षात अवतरण का ) सूर्य अस्त होने का आभास पहले ही दे दिया.

२. दिवाली के दिन मन में एक तरफ भगवान महावीर के निर्वाणदिवस होने का “अहोभाव” होता  है और दूसरी और उनके इस संसार से चले जाने का “अभाव” महसूस होता है.

 

प्रश्न: क्या आपको भी उनके संसार से चले जाने का अभाव महसूस होता है? जैसे हमें अपने  प्रिय जन  की याद आती है, वैसे महावीर की याद आती है? जैसा परिवार में पिता के “चलेजाने” का दुःख होता है, वैसा परमपितामहावीर के प्रति हमारा सम्बन्ध है? यदि नहीं, तो महावीर के “शरण” में आने की बातें थोथे नारेबाजी के समान हैं.

३. महावीर से जुड़ने का मतलब : उनके  नाम की सारी व्यवस्था से जुड़ना है. सारे जैन सम्प्रदायों से जुड़ना है. सारी बातों को मानना है.
जिज्ञासा : उनकी सारी बातें कौनसी हैं, पहले वो जाननी पड़ेंगी.

 

मतलब सबसे पहले अपने “मन” को पवित्र बनाना होगा और जब खुद को भी लगे कि अब मेरा मन पवित्र हो गया है, तो समझ लेना कि बहुत बड़ा काम इस जन्म का हो गया है.

(अब मन को पवित्र  करने में 15 वर्ष लगाओ कि 5 वर्ष, 1 साल लगाओ कि 1 महीना, 1 महीना लगाओ कि 1 सप्ताह, 1 दिन लगाओ कि 1 घंटा, 1  घडी लगाओ कि 1  क्षण, ये चॉइस आपकी है).

“मन” की शक्ति का अंदाज़ ऐसे तो सबको पता है, पर इस सम्बन्ध में jainmantras.com  की पोस्ट साइट से ढूंढ कर अवश्य पढ़ लें.

 

“मन” का पवित्र होना ही मंत्र जप करने की सबसे बड़ी शर्त है.

“मन” पवित्र तभी होता है जब “धर्म” करने की भावना जगे.

“मन” पवित्र तभी होता है, जब भगवान के वचनों पर श्रद्धा हो.

“मन” पवित्र तभी होता है जब गुरुओं के आगे शेष स्वतः ही झुक जाए.

“मन” पवित्र  तभी होता है, जब वो किसी को भी माफ़ी दे सके और खुद माफ़ी मांग सके.

 

“मन” पवित्र तभी होता है, जब मन में “उल्लास” हो, आनंद हो
(परिस्थितया भले ही कैसी भी क्यों ना हों).

“मन” पवित्र तभी होता है, जब लोक कल्याण की भावना हो,
(लोक कल्याण की भावना तभी आ सकेगी जब “खुद” का “कल्याण” हो चूका हो).

आज बस इतना ही.

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