मंत्र फल (result) के बारे में शंका

jainmantras.com पढ़ने वाले एक पाठक को शंका है कि क्या मंत्र वास्तव में काम करते हैं?
उनकी शंका इसलिए है कि ज्यादातर लोग मंत्र पढ़ते हैं. फिर भी कोई रिजल्ट उन्हें मिलते देखा नहीं गया है.

शंका निवारण :
पुराने जमाने में (आज से लगभग 100 वर्ष पहले) बहुत से लोगों को कितने बीसी (बीस रुपये के) सौ होते हैं, इतना ज्ञान भी बहुत गिना जाता था. क्योंकि 10 रुपये में तो घर में रहने वाले 12 व्यक्तियों (joint hindu family) का एक महीने का खर्च चल जाता था.
उस समय का एक लाख  आज के दस करोड़ रुपये के बराबर है. ये भी हो सकता है कि आज के दस करोड़ रुपये उस जमाने के एक लाख रुपये के मूल्य के बराबर ना भी हों.
उस जमाने में जैन सेठों के पास लाखों कि संपत्ति थी  (इसके प्रमाण लाखों रुपये की लागत से उस समय बनाये हुवे जिन मंदिर हैं) जबकि अन्य लोगों के पास हज़ार की भी नहीं होती थी.

 

कारण?

जिन धर्म में श्रद्धा रखने का  परिणाम!

(इसके बारे में विशेष विवरण jainmantras.com की अगले साल प्रकाशित होने वाली पुस्तक “जैनों की समृद्धि के रहस्य” में आएगा).

आज यदि कोई कहे कि ज़माना बदल गया है. तो उन्हें ये भी ध्यान  रखना होगा कि इसी काल में और इसी वर्ष 14,000  जैन दीक्षाएं हुई हैं, जो  एक रिकॉर्ड है.
इससे ये साफ़ पता चलता हैं कि ज्यादातर लोग अपने पाले हुवे भ्रम के अनुसार मान्यता बनाते हैं और सब कुछ देखकर और जान कर भी अनजान बने रहते हैं.

 

भीतर की ओर कुछ झांक कर देखें:

१. क्या सामायिक बिना मंत्र पढ़े की जा सकती है?
(यदि कोई ये कहे कि मेरे पास सामायिक करने के लिए समय नहीं है तो “साहब” बात सही फरमा रहे हैं. क्योंकि उन्हें जीवन में रोज “धक्के” खाने का नियम है , पर सामायिक के लिए नहीं. जब तक “सामायिक” करने का विचार भी  नहीं आएगा, तब तक “पुण्य” प्रकट होने की शुरुआत नहीं होगी और “धक्के” खाने पड़ेंगे.
याद रहे और व्यवहार में देख भी लें: जो रोज सामायिक करता है, उसका बिज़नेस उत्तरोत्तर बढ़ता है.

२. क्या सामायिक में उवसग्गहरं नहीं बोला जाता?
(किसी से भी पूछो कि वो उवसग्गहरं क्यों पढ़ते हैं तो कहेंगे कि ये स्तोत्र उपसर्ग हरता है. पूर्व में मंत्र प्रभाव से धरणेन्द्र को साक्षात आना पड़ता था. पर कुछ लोगों ने उससे एसे काम करवाये कि गुरु को एक गाथा गुप्त रखनी पड़ी).
जिन्हें मंत्र विज्ञान के बारे में जरा भी विश्वास और श्रद्धा नहीं है, वो भी अब उस गाथा को जरूर जानना चाहेंगे. 🙂

 

उवसग्गहरं स्तोत्र के प्रभाव के बारे में jainmantras.com में कुछ पोस्ट पब्लिश हुई है, जरा ढूंढ कर पढ़ लें. (वो गुप्त गाथा जानने की भी जरूरत नहीं रहेगी).

विशेष: ना सिर्फ जैनों में, बल्कि वैदिक, बौद्ध और मुस्लिम धर्म में भी मन्त्रों का प्रयोग खूब हुआ है.
हाँ, यदि कोई किसी धर्म को ही ना मानें और मात्र शुद्ध आचार को ही माने, तो उसे सामान्य रूप से  किसी “धर्म” और “मंत्र” की बात करने की जरूरत नहीं है.   
पर जब समय की चपेट में आएगा तो वो ना सिर्फ हॉस्पिटल्स और कोर्ट्स के चक्कर काटेगा बल्कि ज्योतिषियों के पास भी जाएगा. मुल्लों के पास भी जाने से नहीं चूकेगा.
jainmantras.com का ये प्रयास है कि लोग अपनी समस्याओं के निवारण के लिए जैन मन्त्रों को ही उपयोग में लाएं. ताकि “वीतराग” की और कुछ कदम  इस मनुष्य भव में चल सकें.

 

(कुछ बातों  का इस पोस्ट में गुप्त रूप से इशारा किया गया है. जो जैनी  रोज “चक्कर में या धक्के” में चढ़े हुवे रहते हैं, उन्हें यदि दिन में या रात को कभी भी “अरिहंत” याद नहीं आते या जानते हुवे भी वो याद नहीं करना चाहते तो समझ लेना कि वास्तव में वो “मंत्र” में विश्वास नहीं रखते और उनका जैन धर्म से कोई लेना देना भी नहीं है – उनके पास जैनी होने की “विरासत” में मिली प्रॉपर्टी की मात्र वो फोटो कॉपीस है और प्रॉपर्टी की तो कुर्की हो चुकी है).

अति विशेष: “अरिहंत” शब्द भी “मंत्र”  ही  है.  

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