ध्यान में जो अनुभव होते हैं वो पुस्तकों से नहीं मिलते

“ध्यान” में जो “अनुभव” होते हैं वो पुस्तकों से नहीं मिलते.

पुस्तकों की
“वहां तक” पहुँच ही नहीं होती !

विडम्बना:

आज अधिकतर साधू और श्रावक “पढ़ने” पर ज्यादा जोर देते हैं
जितना अधिक पढ़ते हैं, उतने अधिक “शंकाशील” होते देखे गए हैं.

सरल उपाय:

जानना “आत्मा” को है
पुस्तकों से पढ़कर “आत्मा” को जाना जा सकेगा?

उत्तर है : कभी नहीं !

प्रश्न:

तब शास्त्र पढ़ना चालू रखें या नहीं?

उत्तर:

“प्रत्यक्ष” गुरु के अभाव में शास्त्र काम में लिए जाते हैं.
जहाँ “गुरु” हों, वहां पढ़ने की जरूरत नहीं !

(याद रहे – श्रावकों को शास्त्र पढ़ने की जरूरत नहीं,
सभी की पात्रता भी नहीं है).

इसलिए पढ़ें कम और जानें अधिक !

उदाहरण के लिए लोगस्स पर चिंतन करें.

लोगस्स में “लोक” की बात आती है.
तीनों लोक में “ज्ञान-प्रकाश” देने की शक्ति रखने के कारण
अरिहंत अति प्रभावशाली, पुण्यवान और प्राणियों का कल्याण करने वाले हैं.

ऐसे 24 तीर्थंकरों का चिंतन करें.
उनका चिंतन तभी हो सकेगा जब उनसे “जुड़ेंगे”.

(उनके बारे में जानेंगे तब जुड़ सकेंगे).

अब प्रश्न करें :
ये सब “जान” कौन रहा है?

उत्तर है:
हमारी “आत्मा” !

होमवर्क:

अरिहंत से जुड़कर हमारी “आत्मा” कहाँ जायेगी?
इसका उत्तर “अरिहंत” से जुड़कर स्वयं ही प्राप्त करें.

महावीर मेरापंथ

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