grah dosh nivaran by jainmantras, jains, jainism

जैन विधि से “ग्रह दोष” निवारण

कई जन ये प्रश्न करते हैं कि क्या ग्रह शांति की कोई जैन विधि है?
उनका ये पूछना स्वाभाविक है.
क्योंकि हम जब भी जन्म-कुंडली दिखाते हैं तो ज्योतिषी को दिखाते हैं.
अब कोई ग्रह “अच्छा” नहीं है तो उसे “अच्छा” करने के लिए ज्योतिषी कुछ विधि बताता है.
ये “जैन” विधि होती नहीं है क्योंकि वो वैदिक धर्म को मानता है.
चूँकि हमें  और कोई विकल्प (alternative) की जानकारी नहीं होती, इसलिए वो जैसा कहे, वैसा कर लेते हैं.

 

समस्या का निवारण फिर भी नहीं होता.
ज्यादातर किस्सों में विधि करने के बाद भी ज्योतिषी का ये कहना होता है कि “पीड़ा” एक साल, डेढ़ साल या ढाई साल रहेगी.
परन्तु “विधि” करने से “शांति” रहेगी.
जन्म कुंडली में गुरु दूषित हो और गोचर में भी दूषित हो, तो कम से कम एक साल झेलना होता है.
जन्म कुंडली में राहु दूषित हो और गोचर में भी दूषित हो, तो कम से कम डेढ़ साल झेलना होता है.
जन्म कुंडली में शनि दूषित हो और गोचर में भी दूषित हो, तो कम से कम ढाई साल झेलना होता है.

 

एक तरफ “ग्रह” ख़राब हैं, ये बात कही जाती है.
दूसरी तरफ उन्हें “शांत” करने की “विधि” बताई जाती है.

यद्यपि कुछ शांति मिलती है और सम्बंधित रत्न पहनने से काफी फायदा भी होता है फिर भी समस्या का पूर्ण निवारण नहीं होता. कारण ये है कि विधि वो स्वयं करता है. अब उसका “मन” हमारे लिए कैसा है, वैसी ही विधि करेगा और वह खुद भी “साधक” है या नहीं, उस पर रिजल्ट कैसा आएगा, ये निर्भर करता है.

 

ग्रह परेशान करें ही नहीं, इसके लिए जैन धर्म में बहुत सरल उपाय हैं.
(होमियोपैथी के इलाज की तरह, जिसमें पहले रोग को बिना लेबोरेटरी टेस्टिंग के अच्छी तरह जाना जाता है फिर “मीठी गोलियां” दी जाती हैं – परन्तु जो रोगी एलोपैथी के मोटे मोटे डोज़ लेने का आदि है उसे होमियोपैथी पर जल्दी से विश्वास नहीं बैठता). इसलिए लोगों को मूर्ख बनाने के लिए होमियोपैथी दवाइयाँ भी अब बहुत महँगी बेचीं जाती हैं क्योंकि लोग स्वयं मूर्ख बनने के लिए तैयार हैं).

 

जैन धर्म में ग्रह शांति की जो भी विधियां हैं, वो खर्चालु ना होकर “सम्यक्क्त्व” को मजबूत करने वाली होती हैं. रोग/पीड़ा/समस्या के कारण जैनी होकर भी मनुष्य जन्म हार जाए, ये हमारे आचार्यों को कैसे सहन हो सकता है? हमें “आत्म” तत्त्व समझाने के लिए ही तो उन्होंने हज़ारों ग्रंथों की रचना की है और मंत्रों की भी और प्रभावक स्तोत्रों की भी.

पर हम ये मान बैठते हैं कि ग्रह शांति की ये विधि ज्योतिषी जो बताता है, उससे अलग कैसे हो सकती है? बिना कुछ किये, मात्र मंत्र जप से समस्या का निवारण कैसे हो सकता है?

 

परन्तु ये भी याद रहे कि जब तक जैन आचार्ये/मुनि/भट्टारक/साधक को ये विश्वास नहीं होता कि “श्रावक” जिन-धर्म के प्रति श्रद्धालु है, तब तक वो कोई उपाय नहीं बताता. क्योंकि मंत्र विज्ञान श्रद्धा पर आधारित है. यदि होमियोपैथी की तरह उसे जैन धर्म पर श्रद्धा नहीं है (मोक्ष प्राप्ति की नहीं सोचता), तब तक जैन मंत्र फायदा भी नहीं करते.

ग्रह शांति के लिए jainmantras.com में एक पोस्ट पहले ही पब्लिश हो चुकी है, कृपया उसे ढूंढ लें. ज्योतिषियों के धक्के खाने से ज्यादा अच्छा है कि jainmantras.com पर कुछ मेह्नत स्वयं करें. कई बार सामान्य वस्तु के लिए ढूंढने की कोशिश करते हैं और “योग” से अद्भुत चीज हाथ में आ जाती है.

 

जैनों के लिए ग्रह दोष निवारण करने के लिए सबसे सरल विधि है :
जिन मंदिर की पूजा करना और पूजन के बाद न्हावन लगाना.
अलग अलग ग्रहों के लिए अलग अलग तीर्थंकरों की प्रतिमा की पूजा की जा सकती है.
(परन्तु ये इच्छनीय नहीं होते हुवे भी सभी करते वैसा ही हैं – यदि एक बार बता दिया जाए की मुनिसुव्रत स्वामी की पूजा या दर्शन करने से “शनि” ग्रह शांत हो जाता है तो वहां शनिवार के दिन भक्तों की भीड़ अचूक मिलती है.

शनिवार को छोड़कर अन्य दिन यदि वो उस मंदिर के दर्शन ना करे तो  इसका मतलब है वो समकिती नहीं, मिथ्यात्वी  है.

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