“महाप्रताप लंकेश्वरी रस”

नाम का प्रभाव
एक बीमार को वैद्य ने  दवा दी. बीमार ने दवा का नाम पूछा.

उत्तर मिला:“महाप्रताप लंकेश्वरी रस”

बीमार को लगा: हां, ये ऐसी ही दवा मुझे चाहिए थी. निष्ठा से दवा ली और ठीक हो गया.
वास्तव में दवा बनी थी: मिर्ची और गोबर की राख से! (बीमारी थी पाजी जुकाम जो बार बार होता था).
इसी प्रकार की श्रद्धा से भगवान का नाम लेने से  लोगों के कार्य सिद्ध हो जाते हैं और मोक्ष भी मिलता है.  

 

देव को वश में करने की बात!
एक श्रावक ने गुरुदेव से कहा-आप मुझे ऐसा मंत्र दें कि देवता भी मेरे वश में हो जाएँ.
गुरु ने  पूछा :
क्या तुम्हारा  परिवार तुम्हारी आज्ञा मानता है? उत्तर: नहीं.
क्या तुम्हारा  पुत्र  तुम्हारी आज्ञा मानता है? उत्तर: नहीं.
क्या तुम्हारी पत्नी तुम्हारी आज्ञा मानती  है? उत्तर: नहीं.
क्या तुम्हारा मन  तुम्हारी आज्ञा मानता है? उत्तर: नहीं.
जब कुछ भी तुम्हारे वश में नहीं है, तो देवता को कैसे वश में करोगे?
(कभी कभी प्रश्न में ही उत्तर समाया हुआ होता है).

 

ज्वर
एक बुढ़िया दिन-ब-दिन क्षीण होती जा रही थी. पोते ने पुछा- आप को कोई बिमारी नहीं है, फिर भी आप दुबली होती जा रही हैं. क्या कारण है? जवाब मिला: जब पड़ौसी के घर “बिलौना” होता है, तब “मथनी” की आवाज ऐसे लगती है जैसे वो मेरी छाती पर चल रही हो.
ईर्ष्या का ज्वर शरीर और मनोबल को ही नहीं तोड़ता, पुण्य को भी तोड़  देता है.

 

उपाधि:
इंग्लैंड का किंग जेम्स बहुत से विद्वानों को डिग्री देता था. एक बार एक विद्वान को उसने लार्ड की उपाधि (degree) देनी चाही. विद्वान ने कहा: आप मुझे “सज्जन” की डिग्री दे दें. किंग ने कहा: मैं आपको डयुक, लार्ड, सर की डिग्री दे सकता हूँ, आपको “सज्जन” (gentleman) बनाने की योग्यता मुझमें नहीं है.

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