“मंत्र” ज्ञान Vs. “ज्ञान” मंत्र : किसका पलड़ा भारी?

“मंत्र ज्ञान” पात्र को ही दिया जाता है.

क्योंकि अपात्र को दिया गया मंत्र यदि सिद्ध हो गया
तो वह समाज के लिए बहुत भारी पड़ता है.

सनातन धर्म में ऐसे कई उदाहरण  हैं

जहाँ  राक्षसों ने साधना करके

वरदान प्राप्त किये
और बाद में पूरी सृष्टि पर ही खतरा बने.

और तो और खुद वरदान देने वाले
देव के लिए भी खतरा बन गए.

 

एक जैन धर्मी में ये  झकझोरने वाला प्रश्न खड़ा होता है  कि
क्या वरदान “देने वाले” में भी वरदान देने  की  “पात्रता” थी?

वैदिक धर्म इसे भगवान की “लीला” कहते हैं और
उनके भक्तों को ये अच्छा लगता है.
तीर्थंकर ऐसी “लीला” कभी नहीं करते

उनकी बातें मात्र और मात्र “ज्ञान” से सम्बंधित होती हैं.

“लीला” मतलब चमत्कार!

 

तीर्थंकर कभी चमत्कार नहीं करते
क्योंकि उनका

“सर्वोच्च कोटि का ज्ञान”

लाखों चमत्कारों से भी करोड़ों गुणा ऊपर है.

 

“पात्रता” मतलब
योग्यता या “एलिजिबिलिटी”

क्या जो अभी योग्य नहीं है,
उसे योग्य नहीं बनाया जा सकता?

यदि उत्तर ना है,

तो फिर हमें  समाज सुधार की

“बात” ही नहीं करनी चाहिए.

 

ये सही है कि व्यक्ति की प्रकृति (नेचर)

उसके बचपन के संस्कारों से आते हैं
परन्तु वही व्यक्ति कुसंगत में पड़कर

बर्बाद भी होते देखे गए हैं.

बार बार ये कहा गया है कि ज्ञानिओं के संपर्क में आकर
“अज्ञानी” भी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं एवं पापी भी सुधर जाते हैं.

यदि पापी को सुधारने की बात नहीं होती

तो “नवकार मंत्र” (“सव्व पावप्पणासणो” )

की कोई उपयोगिता ही नहीं रहती.

 

मूल बात पर वापस आएं :

“मन्त्रज्ञ” को इस बात का पता होना चाहिए कि
“मंत्र” पर उसका स्वयं कितना “कमांड” है.

एक “मन्त्रज्ञ” मंत्र देते समय
उसके पास जितना होता है;

साधक पर प्रसन्नता होने से
उसे उतना प्राप्त करने का
आशीर्वाद दे देता है.

आगे जाकर साधक पर ये निर्भर है कि
वो उसमें अपनी शक्ति कैसे लगाता है.

 

जब साधक जैन मन्त्रों का दुरुपयोग करना “चाहता” है,
तो वो काम ही नहीं करते
क्योंकि जैन मंत्र सम्यकधारी देवों द्वारा अधिष्ठित होते हैं.

इसलिए जो जैनी ये शिकायत करते हैं कि
हमें जैन मन्त्रों से कोई फायदा नहीं हुआ,
तो वो समझ लें कि उनके मूल में भी भूल है.

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