MBA in Mantra Vigyaan

“मंत्र” “विश्वास” (Objective) जगाता है.
“यन्त्र” “व्यवस्था” (Management) खड़ी करता है.
“तंत्र” उस “व्यवस्था” का सञ्चालन (Administration) करता है.

मंत्र, यन्त्र और तंत्र
-इन सबकी “लगाम” (reigns)
मंत्र-साधक (Managing Director) के पास होती है.

जो मंत्र “गुरु परंपरा” (hierarchy) से चलता आ रहा है, वो स्वयंसिद्ध होता है और साधक को वो आसानी से सिद्ध होता है.
जो मंत्र कहीं से “उठाया” (Taken from a book) गया है,
उस के विरुद्ध कॉपी राइट (Copy Right) का केस कभी भी फाइल हो सकता है
और हैवी पैनल्टी देनी पड़ती है.
(हाँ, जिसके सामने “मंत्र” प्रकट होता है,
वो चाहे वैसी “व्यवस्था” उस मंत्र के बारे में कर सकता है).

यदि वो किसी अन्य को वो मंत्र देता हो,
तो ये समझें कि उसने उसको लाइसेंस (Licence) दिया है.

मंत्र साधना मात्र खुद के स्वार्थ के लिए नहीं होती.
उसका “दायरा” यदि “छोटा” रखेंगे तो “थोड़ा” फल देगा.
“बड़ा” रखेंगे तो बहुत बड़ा फल भी देगा,
जिस प्रकार बिज़नेस मैनेजमेंट करते समय बहुत सी बातों का ध्यान रखना होता है
उसी प्रकार मंत्र साधक को भी बहुत सी बातों का ध्यान रखना होता है