अनंत काल से – “हम” और “नवकार महामंत्र”

jainmantras.com  में
“नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप”
कुल  14 भाग आपने अब तक पढ़े.

आज कुछ “धमाका” करने का इरादा है,
“नवकार” के बारे में कुछ ऐसा कहकर
जिससे पता पड़े कि
“नवकार” की कितनी ऊँची महत्ता है.

 

अनंत काल से हमारी आत्मा भटक रही है,
ऐसा बार बार कहा जाता रहा है.
पर हम पर असर नहीं होता.
(अनंत काल में भी नहीं हुआ, तो अब भी कैसे होगा
यदि सोच नहीं बदलें तो)

और अनंत काल से  ही “नवकार” चला आ रहा है.

मतलब हमारी आत्मा उस समय से इस संसार में है
जब से “नवकार” उपलब्ध था और आज भी है.

 

नवकार जप से अनंत आत्माएं तिर गयी,
अपनी इच्छाएं समाप्त कर के,
पर हमारी इच्छाएं अब तक समाप्त नहीं हुयी,
और यही रवैया आगे रहा तो अनंत काल तक भी  समाप्त नहीं होगी.

गुरु  मुख से अनगिनत बार  हमने “नवकार की महत्ता” सुनी
पर लगभग हर बार उसे “बाउंसर” समझ पर हमने  “छोड़” दिया.
क्योंकि “संसार” की “क्रीज़” पर हम “डटे” रहना चाहते हैं. क्रीज़ पर डटे रहने से ही तो “स्कोर” (पैसा) बनता है और “रिकार्ड्स” (मान सम्मान) भी. 

लोगों से चर्चा करते हुवे जब पूछा जाता है कि आपकी दिनचर्या में “धर्म” का कितना “पुट” है
तो जवाब मिलता है : मैं तो “खाली” ३/१२/२१ या एक नवकारवाली गिनता हूँ.

 

“खाली” शब्द का प्रयोग वो बहुत “विश्वास” से (जोर देकर) करता है
क्योंकि उसे लगता है कि “नवकार” में तो ऐसा कुछ नहीं है
15-20 साल से फेर  रहा हूँ, इसलिए कुछ “ऊँचा” मंत्र हो तो बात बने!

कहने का अर्थ ये है कि उनके चित्त में नवकार के प्रति वो श्रद्धा नहीं है, जो एक जैनी में होनी चाहिए.
जबकि बचपन से वो सुनते हैं कि “नवकार” से बड़ा कोई मंत्र नहीं है,

आश्चर्य तो इस बात का है कि  उनकी “सोच” इतनी “बड़ी” है कि
उन्हें “नवकार” से भी कुछ और “बड़ा” चाहिए.
नवकार के बारे में ऐसी सोच के कारण एक ही चीज बढ़ी है :

 

और वो है:-

भव-भ्रमण!

(पर हमें  इस बात कि कहाँ फिक्र है, फिक्र करना तो धर्मगुरुओं का काम है हमारे बारे में – क्योंकि हम सोचते हैं कि कहना तो उनका “काम” ही है – हमारे खुद के पास “कितने काम” हैं, वो क्या जानें !).

फोटो:
अति प्रभावशाली श्री महावीर स्वामी जिनालय,
पार्श्वनगर काम्प्लेक्स, कैलाशनगर,सूरत-395002

 

 

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