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चिंतन कणिकाएं-6

हमारे “दिल” में
अभी “भगवान्” की
“चाहत” ही कहाँ है.

हमारे खुद के दिल की
“धड़कन” को तो मापने के लिए
हमें डॉक्टर की जरूरत होती है.
(प्रश्न गम्भीर है).

जब “चित्त” में
“शांति” होती है,
तभी “आत्मा” “तक”
“पहुँच” हो पाती है.

जो “धर्म उपदेश”
हमें “आत्मा” (Soul) के बारे में “सचेत” नहीं करता,
वो अनन्त भवों में
अभी तक किये गए “धर्म” की तरह ही
“व्यर्थ” होगा.
(बहुत विचार करें,
ये पढ़ने के बाद भी यदि
“आत्मा के बारे में जाग्रति” नहीं आती है
तो समझ लेना कि “धर्म” के नाम पर
हमने आज तक “तमाशा” ही देखा है
और आगे भी “वही” देखना चाहते हैं).

साधारण मनुष्य में
इतनी “चेतना” होती है कि
“आत्मा” के लिए जो कल्याणकारी बातें होती हैं,
उन्हें वो “अच्छी तरह दबा” कर रखने की
“चेतना” रखता है.

“आत्मा” नाम का तत्त्व
यदि “धर्म-शास्त्रों” (Religious Books)से निकाल दिया जाए,
तो फिर “सारे शास्त्र”
उस विशाल समुद्र की तरह हैं
जिसका “खारा पानी”
“पीने” योग्य नहीं होता.
भले फिर समुद्र में
खूब “रत्न” (Precious Stones) भरे पड़े हों !

“हमारे जीव” ने
“अनन्त काल” (Infinite time) में
“अनन्त स्थानों” पर
“अनन्त प्रकार” के
सुख-दुःख दोनों “भोगे” हैं.
सिर्फ उसकी “स्मृति” ना होने के कारण (loss of memory)
सारा “दुःख” इसी जन्म में भोग रहे हैं,
ऐसा हमें एहसास होता है.
चौरासी लाख जीव योनि में जन्म लेते हुवे
अनन्त बार अनेक प्रकार के अवतार लिए हैं,
फिर भी “याद”
कुछ भी नहीं !
“अज्ञान” की
और कितनी “पराकाष्ठा” (Limit) हो सकती है !

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