सारे जैन मंदिरों में पूजा क्यों नहीं होती?

१. पूरे भारत भर का एक भी गाँव ऐसा नहीं होगा जहाँ जिन मंदिर ना हों.
हर मंदिर में पूजा हो इसके लिए साधुओं ने गृह मंदिर का निषेध किया ताकि हर व्यक्ति उस मंदिर की पूजा करे जो सम्पूर्ण रूप से वास्तु-शास्त्र के अनुसार बनाया गया हो और मंत्रो से प्रतिष्ठित हो.

२. कालांतर में धंधे के कारण जैनों को अपने अपने गाँव छोड़ने पड़े इसलिए मंदिरों की पूजा बंद हो गयी.

३. मंदिरों में पूजा बंद होने का सबसे बड़ा कारण है :
वर्षों से ज्यादातर श्वेताम्बर मूर्तिपूजक साधू -साध्वियों का गांवों में चातुर्मास ना करना.

४. इसका नतीजा ये आया कि साधुमार्गी सम्प्रदाय ने गांवों में चातुर्मास करना शुरू किया. मूर्तिपूजक सम्प्रदाय से अलग होने के कारण शहरों में तो उन्हें “उपाश्रय” मिलते नहीं थे. इसलिए उन्होंने उन गाँवों की और प्रस्थान किया जहाँ कोई जैन साधू-साध्वी रुकता नहीं था.

५. आज साधुमार्गी तेरापंथ की भी ये स्थिति है कि बीदासर, सुजानगढ़ इत्यादि स्थानों पर साधुओं की कमी है जहाँ तेरापंथी जैन बहुत हैं, ऐसा खुद वहां के तेरापंथी निवासी कहते हैं.

६. बहुत से मारवाड़ी असम और बंगाल शिफ्ट हुवे. कुछ ही वर्ष पहले ये जानने में आया कि असम में तो अट्ठाई करने के बाद जैनी “काली माता” के मंदिर में लडडू चढाने जाते थे.

७. इसका कारण ये था कि “घर में जिन मूर्ति रखने से “आशातना” होती है, इसलिए ज्यादातर स्थानकवासी और तेरापंथी अपने घरों में हनुमानजी, राम और कृष्ण के फोटो लगाते हैं परन्तु महावीर का फोटो नहीं लगाते.

८. कई बार कुछ श्रावक अमुक मंदिर बहुत चमत्कारी है, इसलिए ज्यादातर पूजा करने वाले भी वहीँ पूजा करते हैं और बाजू में दूसरा जैन मंदिर हो वहां दो आदमी भी दर्शन करने के लिए नहीं जाते.

 

९. घर में जिन-मूर्ति रखने में कोई दोष नहीं है. खुद हर साधू-साध्वी अपने पास तीर्थंकरों की मूर्ति रखते ही हैं.

१०. जिन मूर्ति के रोज दर्शन करने से “सम्यक्तत्व” दृढ़  बनता है.

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