“मंत्र विज्ञान” और “ज्योतिष”

क्या “मंत्र विज्ञान” ज्योतिष से भी ऊपर है?

जो होने वाला है, वो ज्योतिष बताता है.
जो नहीं होने वाला है, वो भी ज्योतिष बताता है.

जो हो भी सकता है और नहीं भी,
फिर भी “योग” हैं,
ऐसा कहना एक “सफल” ज्योतिषी की निशानी है.

 

२८ साल के लड़की के जन्माक्षर
जब किसी ज्योतिषी को बताये जाते हैं
तो वो बिंदास कहता है कि “विवाह” देरी से होगा.
अभी और समय लगेगा.

वो “सत्य” ही कहता है,
ऐसा जन्म-कुंडली दिखाने वाले को एहसास होता है.

यदि कोई कहे कि बड़े ही ख़राब ग्रह हैं अभी तुम्हारे,
तो बेचारा रोता हुवा कहता है, कुछ “उपाय” बताओ.

 

“मंत्र-सिद्धि” ना होने पर इधर-उधर के
टोटके बताये जाते हैं,
कुछ शांति मिलती है पर कुछ ही दिनों
में ये उपाय करने वाला थक जाता है.

“शनि-राहु” की दुर्दशा पर होने पर कभी उपाय के रूप में ”

 

काले कुत्ते” को रोटी खिलाने के लिए कहा जाता है
और “दुर्भाग्य” से “शहरों” में तो क्या,
आजकल गावों में भी “काला -कुत्ता” नहीं मिलता.
ऐसी स्थिति में क्या करें?

“धर्म” की “शरण” में जाएँ.
“नवकार मंत्र” को “ग्रहण” करें.
मात्र बोलें नहीं.
गुरु की उपस्थिति से भी बढ़कर है :नवकार.
गुरु का सान्निध्य तो हर समय मिलता नहीं है.
नवकार में तो एक गुरु नहीं,
“पांच गुरु” हैं.

 

नवग्रह में भी ५वां ग्रह “गुरु” ही है.
ज्योतिष के अनुसार जिसका “गुरु”
अच्छा हो उसका कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता.

तो जिसके “पांच गुरु” हों, और वो भी सर्वश्रेष्ठ,
उसका कौन कुछ बिगाड़ सकता है !

 

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