श्री अजितशांति स्तोत्र

श्री शांतिनाथ भगवान एक ही भव में चक्रवर्ती और धर्म चक्रवर्ती (तीर्थंकर) दोनों हुवे एक साथ हुवे हैं.
(जैसे आदिनाथ भगवान इस अवसर्पिणी काल के प्रथम राजा और प्रथम तीर्थंकर एक साथ हुवे हैं)
उनके प्रभाव को शब्दों में कैसे बताया जा सकता है?

सोलहवीं शताब्दी तक श्री शांतिनाथ भगवान के मंदिरों की अधिकता थी.
इसीलिए कई मंदिरों में आज भी आरती “शान्तिनाथ” भगवान की ही  गायी जाती है यद्यपि नए मंदिरों में अब आदिनाथ भगवान की आरती ही गायी जाती है.

 

“नव-स्मरण” स्तोत्र में “अजित -शान्ति ” स्तवन अत्यंत प्रभावशाली ही नहीं, व्याकरण की दृष्टि  से भी अद्भुत है.
संस्कृत के लगभग सभी छंदों का इसमें प्रयोग हुवा है.

कई सम्प्रदायों में सुविधा की  दॄष्टि से संस्कृत के सूत्रों का  हिंदी या उस समय की प्रचलित लोकल भाषा में अनुवाद कर दिया गया है. उनके सम्प्रदाय में साधुओं को संस्कृत का व्याकरण पढ़ने की अनुमति जो नहीं है. उनके अनुसार  संस्कृत का व्याकरण पढ़ने से मति भ्रमित हो जाती है (?)

इसलिए  जैन  धर्म  के  अति प्रभावशाली सूत्र  जो मंत्रिगर्भित   हैं, उनसे  वो  वंचित  हैं.

 

एक  अजितशांति स्तोत्र में ही संस्कृत के कई छंदों का प्रयोग हुआ है. इनके नाम हैं : –
१. गाथा
२. मागधिका
३. आलिंगनक
४. संगतक
५ सोपानक
६ वेष्टक-(१ और २)
७ रसालुब्धक
८ चित्रलेखा
९ नाराचक (१,२  और ३)
१० कुसुमलता
११ भुजगपरिरिन्गित
१२ खिद्यतक
१३ ललितक (१ और २)
१४ किसलयमला
१५ सुमुख
१६ विद्युद्विलसित
१७ रयणमाला
१८ क्षिप्तक- (१ और २)
१९.दीपक
२० चित्राक्षरा
२१.नन्दितक
२२ भासुरक
२३ वानवासिका
२४ अपरान्तिका

 

प्रश्न : छंद का क्या महत्त्व हैं?
उत्तर :
१. यदि परंपरा से समय बीतने के साथ सूत्र में कहीं अशुद्धि आने लगी हो, तो उसे पकड़ा जा सकता है.
२. इसका कारण ये है कि एक छंद में कितने अक्षर होंगे, कितने गुरु और कितने लघु अक्षर होंगे, ये निश्चित होता है.
३. हमारी आर्य संस्कृति बड़ी शालीन रही है. मुंह से बोले जाने वाला एक एक शब्द बड़े विचार से बोला जाता था. भाषा में बड़ी शुद्धि रखी जाती थी.

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