श्री ऋषिमण्डल स्तोत्र का अचिन्त्य प्रभाव

आद्यन्ताक्षर-संलक्ष्य,-मक्षरम् व्याप्यं यत् स्थितं |
अग्निज्वालासमं नाद-बिंदु-रेखा-समन्वितम् ||१||
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दुर्जना भूतवेताला: पिशाचा मृदगलास्तथा |
ते सर्वेsप्यु पशाम्यन्तु, देवदेवप्रभावत: ||८१||

(सभी दुष्टों से छुटकारा मिलता है).
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एता: सर्व महा देव्यो, वर्तन्ते या जगत्त्रये |
मह्यं सर्वा: प्रयच्छन्तु, कान्तिम्,  कीर्तिम् , धृतिम्  मतिं ||८४||

 

(इस स्तोत्र के प्रभाव से सभी इच्छित प्राप्त होता है).
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एतद गोप्यं महास्तोत्रम्, न देयं यस्य कदाचित् |
मिथ्यात्वावासिने दत्ते, बालहत्या पदे पदे ||९३||

ये स्तोत्र  अत्यंत गुप्त रखने लायक है, मिथ्यात्वी को देने से पद पद पर बाल हत्या का दोष “देने” वाले को आता है. इस स्तोत्र का प्रभाव ही ऐसा है कि “मिथ्यात्वी” इसे पढ़ ही नहीं पायेगा पर “देने” वाले को दोष जरूर आएगा.

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श्रीवर्द्धमानशिष्येण, गणभृद गौतमर्षिणा |
ऋषिमण्डलनामैतद्, भाषितम् स्तोत्रमुत्तमम् ||१०२||

 

श्री गौतमस्वामीजी की ये अद्भुत रचना, १०२ गाथा वाला, जिसे मात्र और मात्र सम्यक्त्वधारी ही पढ़ पाते हैं, असम्यक्त्त्वधारी को यदि इसके रहस्य बताये जाएँ, तो हर पद पर “बतानेवाले” को “बाल-हत्या” का दोष आता है (!)

“आयम्बिल” करने से पहले इसे पढ़ा नहीं जा पाता, यदि चेष्टा करे तो “सरदर्द” होने लगता है.

इसे कैसे पढ़ना है, इसकी विधि भी इसी स्तोत्र में दी हुई है, “गुरुओं” के सानिध्य में इसे सीखें.
जिसे जिनेश्वर भगवंत पर संपूर्ण श्रद्धा है और मोक्ष का इच्छुक है, उसे ही ये स्तोत्र सिद्ध होता है.

श्री ऋषिमण्डल स्तोत्र का मूल मंत्र है :
(फोटो देखें)

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आदमी “शिक्षित” तब होता है जब उसका “मन” शिक्षित होता है.
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