मनुष्य जन्म की चेतना

“भय” तो “जन्म” लेने में ही है और सबसे विशेष “मनुष्य भव” में!
तभी तो वो “रोता हुआ” संसार में आता है.

यदि जन्म के समय ना रोये, तो नर्स द्वारा रुलाया जाता है.
ये “संसार” का  First Treatment है!

“बच्चा” रोते हुए इसलिए पैदा होता है क्यों कि सबसे ज्यादा “चेतना” भी तो मनुष्य जन्म में ही होती है. “संसार” में दुःख है, उसे इस बात का ज्ञान पूर्व भव के “संस्कारों” के कारण होता है.

 

बाद में उसी “बच्चे” को “झुनझुना” दिया जाता है.
गर्भावस्था में उसने अपनी “नाद” (आवाज) सुनी थी,
ये आवाज उसे कुछ “पहचानी” सी लगती है
इसलिए “अनजाने ” भी उसे कुछ “जाने पहचाने” लगने लगते हैं.

ये कहे जाने वाले “अपने” भी पहले उसे “पहचानते” नहीं हैं.
पर अपने यहाँ “हुआ,” इसलिए “अपना” मानते हैं.

यही मनुष्य “संसार” में कई बार रोता है, बात बात पर भी रोता है,
रोने की बात ना हो तो भी कईओं को रोते हुए देखता है –
“जन्म से संस्कार” ही रोने का लेता हुआ जो आया है.

 

मरने के पहले उसमें “असीम शांति” आ जाती है. ये शांति उसके मरने के बाद के चेहरे पर देखी जा सकती है.
अच्छा ये है कि  इस “असीम शांति” का अभ्यास (“ध्यान” में आगे बढ़कर) अभी से ही कर लिया जाए, तो जिंदगी भर रोने से बचा जा सकता है.

यही “स्थिरता” (Stillness) ही तो “मोक्ष” का “ट्रेलर” है! 

“ध्यान” से इसे प्राप्त किया जा सकता है और हर व्यक्ति इसका अधिकारी है.

कई सोचते होंगे कि “मोक्ष” में एक ही जगह पड़े रहने से क्या “मजा” आता होगा?
प्रश्न:
“नींद” में क्या मजा आता है?
प्रतिप्रश्न :
“नींद” में जो चले उसे क्या कहेंगे?

 

कईओं के लिए “निद्रा” जैसा “सुख” और कहीं नहीं है.
सारा संसार भले जागे, पर वो तो “मस्त” है,
खर्राटों के साथ (with surround sound) जिसे दूसरे ही सुने, पर वो ना सुने. 🙂

प्रश्न:
“नींद” लेने से क्या प्राप्त होता है?
उत्तर:
“आराम”

प्रश्न:
“मोक्ष” में कौनसा सुख है?
उत्तर:
“जीव” सदा के लिए “जागते” हुवे भी
“आराम” करता है.

 

जैसा आराम  हम जागते हुए आरामदायक सोफे पर करते हैं.

खुद तीर्थंकर कहते हैं की मोक्ष सुख का वर्णन 1000 जीभ (tongues) हो, तो भी नहीं किया जा सकता! “आरामदायक सोफे” का उदाहरण तो “मोक्ष सुख” का “निकृष्टतम ” उदाहरण है.

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