1. सर्वप्रथम माता सरस्वती को नमस्कार करके नीचे लिखा मंत्र 3 बार बोलें.
ॐ ह्रीं वद वद वाग्वादिनी भगवती सरस्वती मम जिह्वाग्रे वासं कुरु कुरु स्वाहा ||
2. नहाकर
3. आदिनाथ भगवान की तस्वीर और
पांच परमेष्ठी का यन्त्र (गट्टाजी -ऊपर फोटो जैसा ) लेकर बैठें.
(अच्छा हो अपने गृह मंदिर में ही स्थापित कर लें)4. दीपक और सबसे सुगन्धित अगरबत्ती करें.
5. एक नवकार गुने.
6. विशेष: अब एक बार “नमुत्थुणं सूत्र” से भगवान की स्तुति उसी भाव से करें जैसे आप स्वयं “इन्द्र” हों.
7. फिर नीचे लिखा मंत्र 7 बार बोलें.
श्री तीर्थंकर गणधर प्रसादात् एष: योग: फलतु
सद्गुरु प्रसादात् एष: योग: फलतु ||
अब मन में
8. शत्रुंजय तीर्थ के मूलनायक श्री आदिनाथ भगवान
या
अन्य तीर्थ के आदिनाथ भगवान की छवि (जो तस्वीर आपने लगायी है) को नमस्कार करें.
9. “कदर्पी यक्ष” को नमस्कार करें.
10. विमलेश्वर यक्ष और चक्रेश्वरी देवी को नमस्कार करें.
11. अपने सहायक देवों को भी उपस्थित होने के लिए प्रार्थना करें – “अब मैं पांच परमेष्ठी की भक्ति करने जा रहा हूँ, आप भी इसमें शामिल होवें.”
12. ये कहकर नीचे लिखे भक्तामर स्तोत्र के मूल मंत्र का जाप 32 बार रोज सवेरे उठते ही कर लें ताकि कभी चूक ना हो. यदि भक्तामर स्तोत्र आता हो तो वो भी पढ़ें.
ॐ नमो अरिहंताणं,
सिद्धाणं,
सूरीणं,
उवझ्झायाणं,
साहूणं
मम ऋद्धिं वृद्धिं
समीहितम्
कुरु कुरु स्वाहा ||कुल 15 मिनट की विधि है.
जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति होगी,
इसमें कोई शंका नहीं है.(“मैं तो उठता ही देरी से हूँ, सोता ही देरी से हूँ,”
वो अपने में ही “मस्त” रहें – उनके लिए ये विधि नहीं है ).फोटो: श्री आदिनाथ भगवान, राणकपुर तीर्थ