पहले नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप 1-8पढ़ें.
नवकार के विराट स्वरुप का अर्थ है : जिसमें सारा जैन धर्म समाया हुआ हो, वो है नवकार!
इस काल में ना तो “चौदह पूर्व” (जैन धर्म का संपूर्ण ज्ञान) हैं और ना ही हमारी इतनी स्मृति रही है कि हम उन्हें “पढ़” भी पाये.
और तो और श्री हेमचन्द्राचार्य ने जितना “लिखा” है (3.5 करोड़ श्लोक), उतना हम “पढ़” नहीं सकते.
सामान्यतया पढ़ने की अपेक्षा लिखने में 10 गुना समय लगता है बल्कि कई बार तो 20 गुना भी या इससे भी अधिक.
मैगज़ीन का एक आर्टिकल जो हम 30 मिनट में पढ़ते हैं, उसे लिखने में लेखक को कई बार 2 दिन लगते हैं और कई बार तो 7 दिन भी!
इसीलिए भगवान महावीर (हर तीर्थंकर) के शासन में “गणधरों” की व्यवस्था रही है, क्योंकि बोला हुआ पूरा स्मृति में नहीं रहता और आगे आने वाली पीढ़ी के लिए तो “शास्त्र” ही “भगवान” का स्वरुप है और “गुरु” का भी!
“शास्त्र” को बोलने, लिखने या समझने में थोड़ी भी भूल हो तो वो “शस्त्र” बन जाता है : एक ही धर्म में अलग अलग संप्रदाय इसी कारण तो बने हैं.
“अनेकांत” के सिद्धांत को भूल कर सभी अपने अपने “मत” से “भयंकर राग” रखते हैं और दूसरे “मत” को मानने वालों के प्रति “भयंकर द्वेष” भी!
“मत-लब” अपने “मत” के लिए इतने “मतवाले” बन जाते हैं कि “मूल धर्म” को ही भूल जाते हैं. दूसरे समुदाय के साधुओं को “गोचरी” बोहराने” के लिए भी “संघ” में मना करते हैं.
ऐसे साधू नवकार में “नमो लोए सव्व साहूणं” पद गुणते हों, तो वो व्यर्थ हैं. रटने के अधिकारी नहीं है. अरे! नवकार गुणने के भी अधिकारी नहीं है. (शास्त्र में तो “नवकार” कैसे गुणना हैं, उसकी विधि भी “गुरु” से सीखनी होती हैं-भले ही आपको नवकार बोलना आ गया हो) ऐसे साधू “मिथ्यात्वी” हैं भले ही उनका संघ दिखने में बड़ा दिख रहा हो.
(jainmantras.com की एक अन्य पोस्ट में “अंगारमर्दक” आचार्य का किस्सा पढ़ें कि किस प्रकार 500 शिष्यों के आचार्य मन में “अरिहंतों” को मारने की “भावना” रखते थे! )
अब उनके “अंध-भक्त” कौनसी “दशा” प्राप्त करेंगे, कहना मुश्किल है. क्योंकि ऐसे गुरु को यदि फॉलो किया (दूसरे सम्प्रदाय के साधुओं को गोचरी नहीं बोहरायी) तो श्रावकों द्वारा गुणा जाने वाला नवकार भी “अधूरा” ही हुआ!
जैन एक हैं तो नवकार के कारण!
विशेष: भगवान महावीर ने “सही को सही” कहने और “गलत को गलत” कहने से रोका नहीं हैं. “सही को सही” कहने से उसके प्रति कोई राग नहीं होता और “गलत को गलत” कहने से उसके प्रति कोई “द्वेष” नहीं होता.
“धर्म” में अपनाये जाने वाले “अधर्म” को कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता. भगवान महावीर के कानों में किले ठुके, वो पूर्व कर्म उन्होंने “छिपाया” नहीं, बल्कि “भरी सभा” में स्वीकार भी किया, जबकि उस कर्म का फल तो वो भोग ही चुके थे.
आगे नवकार महामंत्र का विराट स्वरुप- 10पढ़ें.




