शत्रुंजय (पालीताणा) महिमा-2

देवकृत शत्रुंजय गिरि  वर्णन :

1. अन्य तीर्थों में उत्तम दान, शील, पूजन, ध्यान इत्यादि करने से जो फल प्राप्त होता है, उससे “अनन्तगुणा” फल श्री शत्रुंजय की मात्र “कथा” सुनने से होता हैं.

(जिनका पुण्य बल क्षीण हो चूका हो – धंधा में नुक्सान या कमी, घर में कंकास (Divorce तक की नौबत आ चुकी हो), बिमारी, सरकारी भय, शत्रु भय, बच्चे कहना ना मानते हों, उन्हें जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी “शत्रुंजय तीर्थ” की “पूरे परिवार सहित” यात्रा करनी चाहिए).

 

2.शत्रुंजय तीर्थ के 108 शिखर (mountains) हैं.

3. इस तीर्थ पर हर जगह जिनालय हैं, गणधरों के पगले हैं और गुफाओं में योगी रहते हैं.

दृष्टांत  : कण्डु राजर्षि :

चंद्रपुर नगर का राजा कण्डु बड़ा पापी था. पूर्व जन्म के पुण्य से इस जन्म में राजा बना पर इसी जन्म के पाप के उदय से तब का रोगी हुआ. एक बार राज दरबार में बैठा था तब आकाश में से “कल्पवृक्ष” के एक पत्ते पर नीचे   लिखा “श्लोक” उसके सामने गिरा.

 

“धर्मादधिगतैश्वर्यो, धर्ममेव निहन्ति य: |
कथं शुभायतिर्भावी, स स्वामिद्रोहपातकी ||

“श्लोक पढ़कर राजा चिंतित हुआ और “मरण” में ही “शरण” लेने की ठानी और राजमहल छोड़ दिया.
रास्ते में सामने एक गाय दौड़ती आई और ऐसे आई मानो राजा के “प्राण” ही ले लेगी, राजा ने तुरंत तलवार से उसके दो टुकड़े कर दिए.
(खुद मरने चला था, पर मरने का मौका सामने से आया तो सामने वाले को ही मार दिया).

 

तुरंत “गौत्र देवी-अम्बिका” प्रकट हुई और कहा कि मैं तुम्हारे “अभिग्रह” की परीक्षा कर रही थी. तुम्हारे पूर्वजों के “पुण्य” से आकर्षित होकर तुम्हारे सामने आई हूँ, अब भी समय है, सुधर जाओ और “धर्म” को अपनाओ.

राजा के मन को शान्ति मिली और “कोल्लाक” पर्वत पर आया. वहां एक पेड़ के नीचे रात गुजारी. एकदम सवेरे हाथ में गदा लिए कोई यक्ष सामने आकर बोला : याद है? तुमने ही मुझे मार कर मेरी पत्नी का हरण किया था. अब तुझे नहीं छोड़ूंगा.
अपने पूर्व पापों का प्रायश्चित्त करते हुए राजा ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और जम कर उसकी मार खा ली. थक कर राजा को एक गुफा में छोड़कर चला गया. तब “गौत्रदेवी” प्रकट हुई और खुश होकर बोली : अब तू “शत्रुंजय” जा और अपना कल्याण कर.

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