धर्म क्या है? भाग-2

पहले पढ़ें: धर्म क्या है?-भाग-1 (दिए गए लिंक पर क्लिक करें).

“चक्किदुगं हरी पणगं, पणगं चक्कीण केसवो चक्की
केसवचक्की केसवदु, चक्की केसीय चक्कीय ||

हरिभद्र: मुझे इस श्लोक का अर्थ जानना है. जरूर इसमें कोई रहस्य छिपा हुआ लगता है.
जिनभट्ट्सुरीजी :(मन में ये जानकर कि जिन शासन की प्रभावना करने के लिए एक महान पुण्यशाली आत्मा आई है. अन्यथा मात्र एक श्लोक के अर्थ को जानने के लिए “राजपुरोहित” स्वयं क्यों आता)?
इसलिए कहा: हे भद्र! (नाम था :हरिभद्र – “हरि यानि -भगवान” और भद्र यानि विशिष्ट पुरुष)!
जिनशासन के रहस्यों को जानने के लिए मात्र अर्थ जानना ही पर्याप्त नहीं है. इसके लिए तुम्हें  दीक्षा लेनी होगी. विनयपूर्वक दीक्षा में अपने से बड़े सभी को प्रणाम करना होगा.  विनयपूर्वक वंदन से ही जिनशासन के रहस्य समझ में आ सकेंगे, इसलिए उंतावल ना करो और “धर्म” की शरण में आवो.

 

राज्य के राजपुरोहित होते हुवे भी उनका अगला प्रश्न था : “धर्म” क्या है?……??…..??

(पाठक थोड़ी देर के लिए पढ़ना बंद करें और चिंतन करें कि वर्तमान में जितने दीक्षित हैं, उनमें से कितनों को धर्म के “वास्तविक स्वरुप” का पता है और यदि पता है तो उसके अनुसार आचरण भी है क्या? ज्यादातर को तो “जिन धर्म” के रहस्यों का पता ही नहीं है क्योंकि दीक्षा के पहले वर्षों में “सूत्र रटने” के बाद उसका चिंतन मनन बंद हो जाता है .सूत्र भी उसी प्रकार रटे जाते हैं जिस प्रकार ट्यूशन क्लासेस में बच्चे रटते हैं – ज्यादातर की तो “चिंतन और मनन” की शुरुआत ही नहीं होती और उनका व्याख्यान मात्र नैतिकता, परिवार और मैनेजमेंट के सूत्रों पर आकर “अटक” जाता है.

“सूत्र रहस्यों” को जिन सम्प्रदायों ने जाना नहीं है उन्होंने “सरलता” के लिए कई स्थानों पर सूत्रों को तोड़ कर छोटा किया है और भी सुविधा जहाँ लगी वहां सूत्रों का अनुवाद ही हिंदी में कर दिया गया है. jainmantras.com का किसी भी समुदाय से विरोध नहीं है क्योंकि परम सत्य तो “आत्मा” ही है, उसको ही जानना  है और मनुष्य जीवन का लक्ष्य उसे ही प्रकाशित करना है. परन्तु कई सम्प्रदाय वाले तो यहाँ तक कह चुके हैं कि हम तो मात्र “आत्मा” तक आकर “अटक” गए हैं.  इसके लिए jainmantras.com की अन्य पोस्ट पढ़ें.

 

स्वयं भगवान महावीर ने श्री गौतम गणधर को कहा – हे गौतम! अभी ही आत्मा कल्याण कर लो क्योंकि आने वाले समय में जिन धर्म में अनेक मत होंगे और “सच्चा” धर्म दुर्लभ होगा. ये जानना भी मुश्किल होगा कि “सत्य धर्म” क्या है. सभी संघ अपने समुदाय को बड़ा बताने की भरसक कोशिश करेंगे.  फिर भी मेरा शासन 21,000 वर्ष तक चलेगा और कई भव्य आत्माएं अपना उद्धार करेंगी. आनंदघनजी ने कहा है कि “आत्मज्ञानी” तो एक करोड़ की जनसँख्या में दो-चार ही होते हैं. वर्तमान में जैनों की संख्या कितनी है, वो हमसे छिपी नहीं है).

अभी कुछ जैन संप्रदाय तो यहाँ तक कहते हैं कि सभी “धर्म” समान हैं और “मानव सेवा” ही सर्वोपरि है.
सभी “धर्म” यदि  समान हैं तो “प्रधानम सर्व धर्माणाम्” की बात झूठी सिद्ध होती है
और “मानव सेवा” ही सर्वोपरि है तो “अन्य धर्म” या “धर्म की अन्य बातें” करना बेकार सिद्ध हो जाता है.

आगे पढ़ें -धर्म क्या है?  भाग-3

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