सम्यक दर्शन क्या होता है?

“सच्ची” बात पर “सच्ची” “आस्था” रखना,
यही “सम्यक दर्शन” है.
हर एक “प्राणी” के लिए “शाश्वत सत्य”
“आत्मा” है.

आज हम “आत्मा” को “छोड़कर”
बाकी सभी चीजों में महारत हासिल करने की “सोचते” हैं.
कैंसर से पीड़ित जीवन के अंतिम समय में भी
कारोबार करते हुवे मैंने २ अरबपतियों को “देखा” है.
ऐसा हम जानते तो बहुतों के बारे में हैं.

हमारा भी यही हाल होने वाला है,
यदि हमने “आत्म” तत्त्व को स्वीकार नहीं किया.

“आत्म-तत्त्व” के उद्धार के लिए जो भी जीव
“लगन” से “लग” गया है
वो भले “किसी” भी “धर्म” को “मानता” हो,
वो “सम्यक्दर्शी” है.

आज तक हम अपनी अपनी “क्रियाओं” को ही
“सत्य” सिद्ध करने में लगे हुवे हैं.
“कई बार तर्क के आधार पर “सिद्ध” कर भी लें,
तो भी “असत्य” बात “सत्य” नहीं हो जाती,
यद्यपि लोगों की नज़र में वो “सत्य” मानी जा सकती है.

हमारी कोशिश कैसी होती है, इसका एक क्लासिकल उदाहरण :
“पानी” अपने गुण धर्म के अनुसार “ठंडा” होता है.
परन्तु जिस छोटे बच्चे ने अपनी समझ में पहली बार पानी देखा है
और वो भी “गर्म” देखा है,
तो वो क्या कहेगा?
वो तो यही कहेगा कि ये खूब “ताता” है.
हकीकत क्या है?
पानी को “ठंडा” “मानने” में उसे काफी समय लगेगा.

बस यही हमारी स्थिति है.
सभी जैन सम्प्रदाय “अपनी-अपनी” क्रियाओं, वस्त्र और व्यवस्थाओं को ही “सत्य” बताते हैं,
दूसरों को “गलत” सिद्ध करने में वो बहुत जोर लगाते हैं.
क्योंकि यदि वो “गलत” सिद्ध ना हुआ, तो खुद के “सम्प्रदाय” का अस्तित्त्व भी “खतरे” में पड़ जाएगा.

सभी आचार्य या गच्छाधिपति
अपनी ही बात को “ऊँची” मानते हैं.
जबकि “सत्य” तो “आत्म-तत्त्व” ही है.
और पूरा जैन धर्म “आत्मा” के उद्धार” की ही बात करता है.
उससे ऊपर और कोई बात “जैन-धर्म” में नहीं है.

(कृपया पोस्ट को काफी गौर से पढ़ें अन्यथा बहुत सी शंकाओं का जन्म होगा. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद भी “प्रश्न” यदि कोई खड़े होंगे तो वो “अलग-अलग” सम्प्रदायों की “क्रियाओं” से सम्बंधित ही होंगे).

ये पोस्ट यदि समझ में आ गयी, तो “सम्प्रदायवाद” का “भूत” अपने आप उतर जाएगा.
सभी अपनी अपनी क्रियाएं करने में स्वतंत्र हैं, “आत्म-साधना” के लिए.
दूसरे क्या क्रिया करते हैं, उन पर यदि “दृष्टि” है,
तो फिर “आत्म-साधना” कर ही कौन रहा है?

More Stories
श्री आदिनाथ भगवान का उत्कृष्ट कुल
error: Content is protected !!