अनादि काल से जैन धर्म में “योग” कोई नया शब्द नहीं है.

जैन धर्म में “योग” कोई नया शब्द नहीं है.

आज प्रचलित शब्द “योगा” का प्रभाव
मात्र “फिजिकल फिटनेस” तक सीमित रहा गया है.

जैन धर्म  में “कायोत्सर्ग”
योग की उच्चतम अवस्था है.

आप शरीर हो ही नहीं,
“आत्मा” का “विराट” स्वरुप हो!

 

मन, वचन और काया के
“योग” से सामायिक की जाती है.
और यही तो “ध्यान” है!

सामायिक करते समय “अन्य” किसी भी वस्तु भी

“ध्यान” देने या रखने की अनुमति है क्या?

नहीं!

पर हकीकत क्या है?

🙁 🙁 🙁

 

कारण?

हमने सामायिक  के रहस्य को कभी जानने की चेष्टा ही नहीं की.
क्योंकि जो हमारे पास होता है, वो कभी मूल्यवान नहीं लगता.

हमारे पास अभी मनुष्य जन्म है, पर क्या परवाह है!

अच्छी तरह जानो :

आसन, मुहपत्ति, चरवला और माला
और सिध्धचक्र का यन्त्र रखकर
बात की जाती है :

कायोत्सर्ग की!

 

मतलब  उस अवस्था तक पहुंचना और  अनुभव करना  कि

आप शरीर हो ही नहीं,
“सूक्ष्म आत्मा” का “विराट” स्वरुप हो!
नमो अरिहंताणं कहने के साथ
आप भूत, वर्तमान और भविष्य में होने वाले सभी तीर्थंकरों
को नमस्कार कर लेते हो और वो भी नाम लिए बिना!

सिध्धचक्र में पंच-परमेष्ठी को नमस्कार करते समय क्या भाव आता है?

नवकार गुनते समय मात्र कुछ ही मिनट में आप सब तक “पहुँच” जाते हो
और जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उन्हें नमस्कार भी कर लेते हो.

“नवकार” की शक्ति का अंदाज़ आया अब तो!

(जरा चिंतन करो, मात्र पढ़ो नहीं)

ये आत्मा इतने भव तक “ट्रैवलिंग” कर रही है
पर अभी तक “डेस्टिनेशन” नहीं आया.

 

कारण?

“डेस्टिनेशन” वो खुद है!

बहुत जगह पहुँच चुकी
पर वहां नहीं पहुंची जहाँ
पहुंचनी चाहिए थी.

“स्व” (सेल्फ) तक पहुंचना
यही “स्वाध्याय” (स्व-अध्याय – सेल्फ रीडिंग) है.

इतने समय से ये ब्लंडर क्यों हो रहा है ?

उत्तर है :

जो चीज हमारी होती है,
उसकी हम इतनी संभाल नहीं रखते,
जितनी दूसरों से ली हुई की रखते हैं.

क्योंकि उसके साथ “रिस्पांसिबिलिटीज” है.
जवाब देना है.

खुद को तो क्या जवाब देना?
जब गलती खुद की ही हो!

पर अब भी पश्चात्ताप हो,
तो गलती सुधार सकोगे.

 

फोटो:

चौदह राजलोक

(हर एक की आत्मा अब तक के भवों में
“सिद्धक्षेत्र” को छोड़कर सब जगह जा चुकी है.)

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