भव आलोचना- स्वयं के गुरु बने रहने का प्रोपेगैंडा
(जीवन भर उन्हें ही याद करते रहना)

कुछ गुरुओं द्वारा भरी सभा में श्रावकों को ये कहा जाता है कि आज तक जो पाप किए हैं वो सब एक एक करके याद करो फिर अपना नाम बताकर हमें “लिख कर” दो, गुरु द्वारा पढ़कर प्रायश्चित दिया जाएगा. कल ऐसे तीन लोगों से बात हुई. ये सारे पत्र गुप्त रहेंगे ही, ऐसी कोई ठोस व्यवस्था नहीं होती.

(महावीर स्वामी द्वारा पापों को लिख कर देने की ऐसी व्यवस्था की गई थी, कभी कहीं सुनने में नहीं आया).

एक बहिन की तबियत ठीक नहीं रहती, उन्हें भव आलोचना में व्रत उपवास के साथ 600 सामायिक का “दंड” मिला है! सामायिक भी दंड स्वरूप है! ऐसी सामायिक करते समय सम भाव आ रहा है या शर्म का भाव आ रहा है! 😞

चर्चा

जैन धर्म में रोज के दो प्रतिक्रमण की व्यवस्था है, पक्खी, चौमासी और सम्वत्सरी के प्रतिक्रमण की व्यवस्था अलग से है.

ये भी न कर सके तो नवकार में सारे पापों का नाश हो जाने की बात है ही!

भव आलोचना जीवन के अंत में ली जाती है न कि 25 – 50 की उम्र में!

क्योंकि जब तक जीवन है तब तक कहीं न कहीं कोई हिंसा आदि पाप कार्य होता है, भव आलोचना लेने से कोई पाप कर्म रुक नहीं जाता क्योंकि जीवन पूरा हुआ नहीं है.

इसलिए सोच समझकर भव आलोचना लें, क्योंकि प्रायश्चित देने वाले को आपके शरीर और मन की स्थिति का पता नहीं है, वो केवली नहीं है.

5 साल पहले आगे भी एक पोस्ट में लिखा था कि एक ट्रस्टी की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर थी इसलिए उसने एक बार ट्रस्ट के 2000 रुपये अपने काम में लिए, 6 महीने बाद वापस जमा कर दिए. गुरु ने प्रायश्चित दिया – 9 लाख नवकार का! जब बात हुई तब लगभग सवा लाख हुवे थे. 60 साल की उम्र हो, कमाने की चिंता हो, घर खण्डहर जैसा हो, वो इतना जाप करे – मजबूरी के 2000 रुपये के लिए?

गुरु का ज्ञान कैसा है?

अरे! बोल देते कि 6 महीनों तक रोज सवेरे उठते ही एक नवकार अपने इस पाप के प्रायश्चित के लिए गिनना. एक नवकार गिने तो 500 सागरोपम के पापों का नाश होता है, पर स्वयं गुरु को इस बात पर विश्वास हो तब ना!

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