अद्भुत योगीसम्राट :श्री शांतिगुरुदेव-2

किसी भक्त को गुरु के बारे में बताने के लिए कहा जाए, तो वो ऐसा ही समझें मानो एक बच्चा अपनी तोतली भाषा में नवकार बोल रहा हो और उसके  दादा-दादी सुनकर बहुत खुश हो रहे  हों.

शांति गुरुदेव के बारे में jainmantras.com पर जो लिखा जा रहा है, उसे भी ऐसा ही समझें.

गुरुदेव की जीवनी के अंश श्री अनिल मेहता (बड़ोदा) की पुस्तक “एक अद्भुत योगी”  से लिए गए हैं.

 

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के लेखक के जीवन में भी शांतिगुरुदेव का बहुत बड़ा आशीर्वाद रहा है. 1989 में संयोगवश मांडोली में गुरुदेव के दर्शन करते समय मन में ये विचार किये कि “आप लोगों की इच्छा पूरी करते हैं, मैंने तो आज तक भक्ति की परन्तु कुछ माँगा नहीं. मेरी स्वयं की प्रैक्टिस चालू कर सकूँ तो जानूँ कि लोग आपके दरबार में क्यों आते हैं.” वहां से सूरत आते ही 7 दिन में स्वयं की प्रैक्टिस चालू की. उसके बाद कभी कुछ मांगने की जरूरत नहीं पड़ी.

तारीख 27-4-2002 को नाकोड़ा जी तीर्थ के दर्शन के लिए जाते हुवे साथियों से चर्चा करते समय मुंह से ये शब्द निकले कि शांति गुरुदेव ने भक्तों को चमत्कार खूब दिखाए पर उनके “उपदेश” कहीं पढ़ने को नहीं मिले जबकि उनको सरस्वती का वरदान था.

 

बोलते ही एहसास हुआ कि “गलत शब्द” मुंह से निकले हैं इसलिए जरूर कुछ “चमत्कार” होगा. 28-4-2002 (चैत्री पूनम) को नाकोडाजी के दर्शन-पूजन बहुत जल्दी हों गए जबकि सामान्यतया पूनम के दिन बहुत भीड़ होती है. साथिओं ने निर्णय किया कि इस बार मांडोली  होते हुए सूरत जाना है.

मन में समझ गया कि आज “कुछ” प्राप्त होगा. मांडोली पहुँचते ही साथी पानी पीने गए और लेखक गया पेढ़ी में – पुस्तक देखी -” एक अद्भुत योगी.” पुस्तक हाथ में लेते ही सीधा पृष्ठ खुला: “गुरुदेव के व्याख्यान से लिए गए वचनामृत!”

और उसी वर्ष Sun-Set Point, आबू में स्थित “श्री शांतिगुरुदेव ट्रस्ट” की ऑडिट करने का सौभाग्य मिला जो ऑडिट 25 वर्ष में कभी  नहीं हुई थी. अन्यथा ये ट्रस्ट की जमीन अग्रवाल समाज में जाने वाली थी. वहीँ के अकाउंटेंट ने मुझे “मार्कंडेश्वर” (गाँव अजारी-सिरोही रोड) में माँ सरस्वती के दर्शन करने को कहा, उस दिन अमावस्या थी. सरस्वती की 25,000 वर्ष पुरानी “काले संगमरमर” की प्रतिमा के “दर्शन” किये और पर उससे पहले वहीं  पर सरस्वती की 12 वर्ष की बाला  के रूप में दर्शन “हुए.”  ये वो ही स्थान है जहाँ श्री हेमचन्द्राचार्य को सरस्वती के दर्शन हुवे और श्री शांतिगुरुदेव को भी!

 

ये सब “गुरु प्रसाद” है –
ऑडिट फीस ना लेने के कारण ट्रस्टी बड़ा आभार मान रहे थे पर मुझे ऑडिट करने की इतनी बड़ी फीस पहले कभी नहीं मिली, ना मिलेगी.
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