मनुष्य को छोड़कर और कोई भी जीव अपने किये पर पछतावा नहीं करता.

भूलें स्वाभाविक है.
भूलें जानबूझकर नहीं की जाती.
जानबूझकर की जाने वाले भूलें तो मूर्खता की श्रेणी में आती हैं.
यदि “भूलें” नहीं होती, तो गुरुओं के सान्निध्य की जरूरत भी नहीं होती.
आधुनिक युग में तो कुछ गुरु भी भयंकर भूलें करते हैं.
(“माया” ने उन्हें भी जकड रखा है).
इसलिए समाज के एक बड़े वर्ग को सही दिशा (right direction) नहीं मिल पाती.

 

“शिष्य” जब सीख रहा होता है,
तभी से “गुरु” में भूल निकालना शुरू करता है,
मानो वो खुद “गुरु” बन गया हो.
रहस्य की बात तो ये है कि “गुरु” प्रकट होते हुवे भी अप्रकट अवस्था में रहता है.
उसके वास्तविक स्वरुप को कोई विरला ही जानता है.
“गुरु” का हर शब्द जब मंत्रमय लगे,
तभी “पात्रता” प्रकट होती है.

 

गुरु की सम्पूर्ण पात्रता होते हुवे भी जिसमें एक भी ऐसा “दुर्गुण” है,
जिसका “भान” खुद उसको भी है, वो गुरु नहीं होता.
मुनि “दुर्वासा” को “गुरु” की संज्ञा नहीं दी जा सकती.
उसे “तप” से प्राप्त ऋद्धि को अपने क्रोध से
“शाप” दे देकर “दूषित” किया है.

जीवन के अंत तक भी ये “क्रोध” उससे छूट नहीं पाया.
प्रश्न है : क्या उसने वास्तव में संसार छोड़ा था?

 

उससे तो वो व्यक्ति भले हैं जो परिवार में रहते हुवे भी शांत रहते हैं.
उन्हें “नमस्कार” करना चाहिए – ताकि उनकी “शान्ति” हमें भी मिले.

चिंतन:
“दुर्वासा” को शिव का अवतार कहा जाता है
हमने कौनसा अवतार लिया है?