“सत्य की खोज”

सत्य को पहले जानना होगा

तभी सत्य बोल सकेंगे.
सत्य जानना” इतना “सरल” नहीं है
जितना “सोचा” जाता है.
“सिद्धि” प्राप्त करने वाला भी “सच्चा” हो
ये जरूरी नहीं है.
वर्तमान में कुछ सिद्धि प्राप्त किये
व्यक्ति ही सबसे बड़े ढोंगी होते हैं.
मतलब ऐसे व्यक्ति की “सिद्धि” बेकार है.
इसे वैसा ही समझें जैसे एक व्यक्ति आज ५,००० कमा कर रात को ऊँची ब्रांड की दारु पीता है.
इससे तो वो व्यक्ति अच्छा है जो ५०० रुपये कमा कर “घर वालों” को सुख देता है.

 

प्रश्न:
दारु पीने वाले ने ५००० रुपये कमाए और
दूसरे ने उसकी अपेक्षा मात्र १० प्रतिशत ही कमाए,
पहले व्यक्ति ने ज्यादा कमाए, क्या ये सत्य है?

“कमा” कर उसी दिन खोने वाले को क्या “कमाना” कहते हैं?
“सत्य” के दोनों पहलू “सच्चे” होते हैं,
मात्र एक पहलू देखकर “सत्य” को “जाना” नहीं जा सकता.

 

चिंतन:
हमारा स्वयं का पहला पहलु कौनसा है
और दूसरा कौनसा है.

उत्तर:
ज्यादातर को अपने पहलू का ही “पता” नहीं है.
तब “सत्य” की तो “शुरुआत” ही कहाँ हुई है !

 

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