“ध्यान” को “ध्यान” से “जानो”-2

पहले पढ़ें:”ध्यान” को “ध्यान” से “जानो”-1

विशेष:

जो मात्र “शान्ति” पाने के लिए “ध्यान” करते हैं उन्हें ये जान लेना चाहिए कि इच्छित वस्तु प्राप्त होने के बाद ही मन शांत रहता है.

 

“ध्यान” के प्रभाव से आप अपना “आभा-मंडल” (aura) ही इतना प्रभावशाली बनाते जाते हैं कि “इच्छित घटनाएं” खुद आपके सामने आकर “खड़ी” हो जाती है मानो हमारी “माँ” आकर बोले कि “बेटा, एक तो और ले ले.” कभी कभी तो “माँ” पूछती भी नहीं तो थाली में रख देती है.

 

सबसे शानदार उदाहरण  है : बाहुबली का!

बहनें आकर कहती है :
वीरा मोरा, गज थकी उतरो!

(याद रहे-दोनों बहनें ही थीं, “ब्राह्मी” के लिए तो वो पति भी रहा था, संयम लेने के बाद आज उनके लिए  “सभी प्राणी” बंधू हो गए – “संसार” के सभी “प्राणी” एक-दूसरे के बंधू ही तो हैं). यदि नहीं होते तो “अनजान” लोगों से हमारा “सम्बन्ध” कैसे हो सकता है? आज भी “शादियों” का सबसे ज्यादा मजा तो “अनजान कुल” में “जान पहचान” निकालने के बाद ही तो आता है. और “बहू” भी तो “अनजान घर” में आती है – अपनी बन कर!

 

जैन धर्म का “संसार” के प्रति दृष्टिकोण ही सबसे निराला है. “घर” में एक “प्राणी” और आया, मतलब एक जीव और मोक्षगामी बनेगा-इसका “उत्साह” है ना कि “एक कमाने” वाला और आया!

बात बाहुबली की चल रही है.
बाहुबली “ध्यान” में हैं.

“सुना कि हाथी से नीचे उतरो”
सोचने लगे कि “जब हाथी पर चढ़ा ही नहीं तो उतरुं कैसे?” 🙁
ये “विचार” उन्हें “गहरे ध्यान” में ले गया.
पहले से “ध्यान” ही तो कर रहे थे!
पर ध्यान था कि “छोटे भाई, जो केवली हो गए है, उन्हें वंदन कैसे करूँ?”
(जबकि जैन धर्म कहता है कि उसे नमस्कार करो  जिसने “गुण” पहले ग्रहण किये हों – यदि पुत्र ने “संयम” पहले ले लिया ली है तो वो पिता से “बड़ा” है यदि पिता “संयम” बाद में लेता है तो).

 

तुरंत “अहं ” को छोड़ा और पाँव बढ़ाया वंदन करने के लिए!
उसी समय “केवल ज्ञान” प्रकट हुआ – जैसे तैयार ही बैठा था प्रकट होने के लिए!

आगे कि बात अब जानने लायक है.
उनकी “इच्छा” थी कि छोटे भाइयों को नमस्कार ना करूँ.
जैसे ही पाँव आगे बढ़ाया, केवल ज्ञान प्रकट हुआ.
अब बताओ, उन्हें अपने छोटे भाइयों को नमस्कार करना पड़ा क्या?
नहीं!
मतलब “मूल इच्छा” जो थी, उससे भी “समझौता” किया
तो भी “किये हुए अविरत ध्यान” के प्रभाव से “मूल इच्छा” भी पूर्ण हुई और “केवलज्ञान” भी प्राप्त हुआ.

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