“मंत्र सिद्धि” मन का विश्वास है.

हर “शब्द” मंत्र है.

पर सभी “मंत्र” और “शब्द” एक समान नहीं हैं.
(यदि होते तो अलग अलग मन्त्रों की जरूरत ही क्यों होती).

मंत्र रहस्य को बहुत कम लोग जानते हैं, उसे “समझाया” नहीं जा सकता.
हाँ, उसे अनुभव जरूर किया जा सकता है.
अपने अनुभवों को खुद तीर्थंकर भी पूरा नहीं बता पाये हैं.
जबकि भगवान महावीर ने 30 वर्ष की प्रवचनधारा में कभी भी एक वाक्य को दुबारा (repeat) नहीं कहा.

 

सिद्धपुरुष के कहे गए हर “शब्द” “मन्त्रस्वरूप” होते हैं.
उन शब्दों को भी “कोई कोई” ही “प्राप्त” कर पाता है.
दूसरों के लिए तो वो “मॉडर्न आर्ट” जैसे ही है.
जो सिर्फ “अच्छे”  लगते है, पर वो है क्या, कुछ पता नहीं पड़ता.
(उसमें होता भी कुछ नहीं है, जो मॉडर्न आर्ट बनाता है; वो भी “शायद” ही जानता है). 🙂

 

मंत्र पर विश्वास की चार अवस्थाएं हैं:
१. संपूर्ण विश्वास
२. कुछ विश्वास कुछ अविश्वास
(उनके शब्द ऐसे होते हैं: जाप तो कर रहे हैं, अब देखो क्या होता है).
३. “शंका”
(पता नहीं क्या फर्क पड़ेगा, मेरे तो कर्म ही “ऐसे” हैं – अब ऐसे “शब्द” खुद “अपने” बारे में ही कोई कहता है, तो उसका तो कोई उपाय ही नहीं है).
४. ये सब (मंत्र) बकवास है.

जरा पोस्ट को दोबारा पढ़ें और कहें कि हमारी स्थिति कहाँ पर है और कहाँ होनी चाहिए.

 

बस एक बार आप अपने आप से कहें :
“मुझे मेरा जीवन सफल बनाना है”

अब इन्हीं “शब्दों” को (ना भूलें कि “शब्द” ही मंत्र हैं) “टेस्ट मोड” पर रखें. फिर  ऊपर की चारों अवस्थाओं को पढ़ें.
क्या आप कह सकेंगे कि मात्र  “सफल” होना या ना होना “उपरवाले” के हाथ में है, इसलिए ये सब बातें करना बकवास है?

3 महीनों में  jainmantras.com में अब तक 250 पोस्ट से भी ज्यादा लिखी जा चुकी है. अब जो पोस्ट लिखी जाएंगी वो हालांकि लिखने में सरल ही रहेंगी पर कुछ कुछ बहुत गूढ़ होंगी. मात्र पढ़ने से समझ में नहीं आएँगी. आपको चिंतन करना होगा. “चिंतन” की “गहराई” में जाने से ही “मोती” मिलेंगे.

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