खाने में पांच द्रव्य ही उपयोग में लेने की बात कही,
कुछ छोड़ने की बात नहीं कही,
अपने आप ही दूसरा सब छूट गया!

इसी प्रकार संयम को समझना.

जो दीक्षा “लेता” है,
वो कुछ जबरदस्ती त्याग नहीं करता,
त्याग अपने आप हो जाता है
क्योंकि अब जो अपनाने लायक है,
वही उसके पास बचा है!

त्याग शब्द जबरदस्ती का है,
अपनाना शब्द आनंद का है,

क्रिया वही, पर भावों में अन्तर!
दिन रात का!

जिस समय साधना करते हैं
उस समय दूसरी क्रिया छोड़ने का भाव नहीं है,
साधना में लीन होने का भाव है..
बस, दूसरी क्रिया अपने आप छूट जाती है!

? महावीर मेरा पंथ ?
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