jainmantras.com के पाठक बार बार ये प्रश्न करते हैं कि मंत्र के रहस्यों को कैसे जाना जाए.

मूल समस्या ये है कि ज्यादातर लोगों ने मंत्र जप शुरू किया है :

१. इधर उधर की पुस्तकों से मंत्र “उठाकर” या
२. किसी के कहने से जिसने खुद मंत्र सिद्ध नहीं किया हो या
३. उस गुरु से मंत्र लिया हो जिसकी खुद की इच्छाएं अभी पूरी होनी बाकी हों.

 

(किस गुरु की ये इच्छा बाकी है, ये उसके चरित्र से पता चल जाएगा
कि उसमें पैसे की भूख अभी गयी है या नहीं).

आपसे निवेदन है कि jainmantras.com आप रोज पढ़ें.
पढ़ी हुवी पोस्ट भी दोबारा पढ़ें. उस पर चिंतन करें.
एक साल तक इस साइट पर पब्लिश  हुई पोस्ट को पढ़ेंगे तो पूर्वभूमिका तैयार हो पाएगी.

 

याद रहे कि आजकल प्राइमरी स्कूलों में एडमिशन के लिए भी डोनेशन देना पड़ता है
और बच्चा क्या ABCD भी सीख लेता है एक वर्ष में?
(मंत्र विज्ञान के विषय में तो साल का आदमी भी एक बच्चा ही है). 

पाठकों की शंका :  
हमारे साधू-संत हर श्रावक को (उसकी परिस्थिति देखते हुवे भी) मंत्र पढ़ने की पूरी प्रोसेस नहीं बताते.

 

निवारण:-
पहली बात तो ये है कि “ज्यादातर” श्रावक तो उनके पास जाते ही हैं कुछ “प्राप्त” करने के लिए. “भक्ति” के लिए नहीं. अपने गुरु के पास “दो-चार बार” जाने से कोई “प्राप्ति” हो जाती तो साधू भी वर्षों तक साधना क्यों करते?

श्रावकों कि अपने ही धर्म पर पूरी श्रद्धा नहीं है. पिछले दस वर्षों में जैन धर्म पर खूब पुस्तकें छपी हैं. कोई पढ़ना ही नहीं चाहता. रोज के 5-10 पन्ने भी पढ़े, तो धर्म में रूचि अपने-आप जग जायेगी. श्रावक खुद धर्म-चर्चा के लिए ग्रुप बना सकते हैं.  

 

समाज में प्रचलित अव्यवस्था”का विरोध विरला ही कोई करता है.कर्म-बंधन के नाम से बेचारा श्रावक ऐसा डरा हुआ रहता है कि गलत बात”का भी विरोध गुप्त-रूप से भी नहीं करता.

दिवाली के समय (फोटो देखें) ये यन्त्र उपाश्रय में किसी ने “फालतू” समझ कर “घर” से बाहर किया है. ये यन्त्र मुझे साध्वीजी ने इसी दिवाली पर दिया है. बहुत प्रभावक जैन श्री यन्त्र है जो पहली बार देखने को मिला है.

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