प्राचीन काल में एक समय ऐसा भी आया जब सारे जैन साधू कर्म काटने के लिए धर्म क्रिया करने लगे, शास्त्र ही रटते रहे, अद्भुत मंत्र पास में होते हुवे वो शास्त्रों में लिखे पड़े रहे, उन मंत्रों की साधना बहुत कम हुई. (आज भी यही स्थिति है).

दूसरी ओर एक स्थिति ऐसी भी आई कि मंत्र घृणित समझे जाने लगे.कुछ यतियों ने मैली विद्या भी साधी, इसके कारण बदनाम भी हुवे.

साधुओं ने मंत्र साध कर उनका उपयोग किया नहीं,
मति ज्ञान और विवेक दोनों चूके,
इसलिए कई बार राज भय और द्वेष के कारण स्थान छोड़ कर भागना भी पड़ा.

फिर कुछ प्रभावक आचार्यों के कारण सभी वापस अरिहंत के उपासक बने. उन्हीं के अजोड़ स्तोत्र हमें उपलब्ध हुवे हैं.

विडंबना ये है कि प्राकृत और संस्कृत का तो छोड़ो,
हम हिन्दी भाषा पर से अभी अपना प्रभुत्व खो बैठे हैं.

जो शास्त्र पढ़ते हैं, वो उतनी साधना नहीं करते.
नहीं तो आज जो मंदिर बंद होने की स्थिति आई है,
वो कभी नहीं आती. (सिर्फ काल के प्रभाव की ही बात न करना, प्रभाव की बात भी करना जो अनेक जैन स्तोत्र में स्पष्ट किया गया है).

अरिहंत के नाम से मंदिरों में पैसा खूब लगता है
पर कुछ तीर्थों को छोड़कर बाकी तीर्थ सूने पड़े रहते हैं.
अनेक प्राचीन तीर्थ स्थलों और मंदिरों के स्थान पर साधना तो छोड़ो, उनकी की देखभाल तक नहीं! प्रभावकता कैसे रहेगी?

तब क्या करें?
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पोस्ट पढ़कर निर्णय लें.

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