“पूजा” करने का सबसे “श्रेष्ठ फल”

प्रश्न:
पूजा का फल क्या है?

जिज्ञासा:
ये प्रश्न एक पाठिका का है. पढ़ने में प्रश्न बहुत
सरल लगता है. पर जिसने पूछा है उसके लिए
प्रश्न बहुत बड़ा है.

 

संतोषजनक उत्तर से या तो पूरी आस्था टिक जायेगी
और यदि ऐसा ना हुआ तो आस्था ही  डिग जायेगी.

कोई भी कार्यविधिपूरक करें तो उसका अच्छा परिणाम आता ही है.
जैन धर्म में धर्म क्रिया मन, वचन और काया से की जाती है.

“सद्धा परम दुल्लहो” – ये वचन भगवान महावीर के हैं.
उन्हीं की उपदेश परंपरा हमें आज तक प्राप्त होती रही है.
कहीं कहीं “सम्प्रदायवाद” के कारण उनके उपदेशों का “अर्थ”
अपनी “बुद्धिनुसार” लगाया गया है.

 

(भगवान महावीर ने हर गणधर को उनकी शंका का समाधान
“वेद” के आधार पर ही दिया. कारण? व्यक्ति को जैसा ज्ञान होता है,
उसी आधार से उसे समझाना बहुत सरल होता है.)

जैन धर्म में हर बात की “टेस्टिंग” साइन्टिफिकली प्रूवड है.
ये बात अलग है की साइंस अभी वहां तक पहुंचा नहीं है.
भगवान महावीर ने जो कहा है, वो उन्होंने “देखा” है,
उनको लेबोरेटरी में जाने की जरूरत नहीं पड़ी.

 

प्रश्न था: पूजा का क्या फल है?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि :

१. हम पूजा किसकी कर रहे हैं?
२. हम पूजा किसलिए कर रहे हैं?
३. हमें पूजा विधि किसने बतायी है?
४. जिसने विधि बताई है,
-उसने खुद क्या “प्राप्त” कर लिया है?
५. और सबसे बड़ा प्रश्न
-हमें पूजा से प्राप्त क्या करना है?

“पूजा” का “फल” बहुत विस्तार लिए हुवे है.

 

पाठकों को ये जानकार आश्चर्य होगा कि
“सरस्वती” की पूजा करने वाले को भी “धन” की प्राप्ति होती है.
पूर्व धारणा ये थी की “सरस्वती” की पूजा करने वाला “दरिद्र” होता है.

इसके पीछे रहस्य ये था कि “सरस्वती पूजन” का अधिकार मात्र ब्राह्मणों के पास था.
आज भी किसी ब्राह्मण को कहें कि मेरे घर पर “सरस्वती” का महापूजन करवाना है,
तो वो इस बात के लिए “सहमति” नहीं देगा (यदि “सच्चा ब्राह्मण” है तो).

 

“ब्राह्मण” का कार्य था पूजा पाठ करवाना और
अब खुद ब्राह्मण भी “पूजा” करने से कतराते हैं.
जो “जाति” से ब्राह्मण हैं उनमें से कई तो “मांसाहारी” भी है.

(कई जैन भी इसमें बाकी नहीं हैं
– प्रश्न खड़ा होता है : जैन होने का क्या “फल” है)?

जबकि हमारे गुरु आजकल ग्रुप में भी सरस्वती पूजन करवा रहे हैं.

 

अब प्रश्न खड़ा होता है कि जिस बात का
ब्राह्मणों में निषेध है वो जैन गुरु क्यों करवाते हैं?

उत्तर है : हमारे गुरु ज्ञान के प्रसार में कोई भी कमी नहीं रखना चाहते
जबकि ब्राह्मण “ज्ञान” को अपना ही “अधिकार” समझते रहे.

इसका अर्थ ये हुआ कि उन्हें इस बात का भी
वास्तविक भान नहीं था  कि
“ज्ञान बाँटने से बढ़ता है”
जिसे हर भारतीय बच्चा भी अच्छी तरह जानता है.

 

पूजा करने के फल:
१. पूजा करने से मन को तुरंत शांति मिलती है.
२. पूजा करने से हम “भगवान” (देवी-देवता भी) के
“रिश्तेदार” हैं, ऐसा अनुभव होता है.
३. पूजा करने से विघ्न दूर होते हैं.
४. पूजा करने से प्रसन्नता रहती है.
(चित्त में प्रसन्नता तभी रहती है,जब कार्य सिद्ध होता रहा हो).
५. पूजा करने का सबसे श्रेष्ठ फल है :
हम खुद “भगवान” जैसा बनने की दिशा में चल पड़ते हैं.

विशेष:
तीर्थंकर अपने श्रावक और श्रावकों को भी अपने जैसा बनने का मार्ग दिखाते हैं.
यही जैन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है.

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