“करुणा” का “पात्र” कौन?

करुणा का पात्र कौन?
1  किसी को दुःख देने वाला
या
2  दुःख सहन करने वाला?
किसी को दुःख देने की बात उसी के मन में आती है जब वो खुद भयंकर दुःख झेल चुका होता है.
उसकी आत्मा को दुःख का अनुभव होता है, दुःख के संस्कार भरे पड़े होते हैं.
संसार में बहुत से विघ्नसंतोषी होते हैं.
देवलोक में भी ऐसे देवों की कमी नहीं है.

 

“किसी को दुःख देने से किसी को सुख प्राप्त होता है”
क्या हम ये सोच भी सकते हैं?
परन्तु कई लोग ये सोचते ही नहीं, दूसरों को दुखी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते.
क्या ऐसा करने से उसे वास्तव में सुख मिलता है?
नहीं, उसे मात्र “मैंने जैसा सोचा, वैसा ही कर डाला”
इसका संतोष होता है, इसमें ही वो सुख “मानता” है.

 

दुःख सहन करने वाला तो “मेरे कर्म ऐसे हैं” इसलिए दुःख मिल रहा है, ये जानकार संतोष कर लेता है.
पर यदि वह “आर्त्तध्यान”  (रोये, मन में खूब दुःख करे, इत्यादि) और “रौद्रध्यान” ( क्रोध करे, गाली दे, इत्यादि) करे
तो वो भी दुर्गति में जाने का “बीमा “कर लेता है.
(बीमे की रकम “maturity” पर ही मिलती है) 🙂

कोई हमारा कुछ भी अहित ना करे, फिर भी यदि हम किसी कारणवश दुखी हैं तो करुणा के पात्र खुद ही हुवे.
कोई हमारा अहित करे यानि बुरा करे, तो करुणा का पात्रबुरा करने वाला है, हम नहीं.

 

यदि ये बात समझ में आ जाए, तो हमारा जीवन सुखी हो जाए.
यदि हम भी ‘उसी” के पीछे पड़ गए, तो “दुश्मनी” को कोई अंत ही नहीं होगा.
जिन्हें “आत्मोद्धार” करना है यानि जो खुद “आत्मा” में ही स्थित हैं, वो तो ऊपर वाली परिस्थिति को “उपकारी” मानते हैं क्योंकि इससे “कर्म” जल्दी कटते हैं.

परन्तु जो ये सहन नहीं कर सकते, वो उपाय ढूंढते हैं.
जैन कुल में जन्म लेने वाला किसी के अहित की बात सोच ही नहीं सकता, करने की बात तो बहुत दूर रही.
किसी ने उसका अहित किया भी है, तो उसका भी अहित करने की वो नहीं सोचता.
(यदि ऐसा नहीं करता, तो रोज रोज या वर्ष में की जाने वाली “क्षमापना” का कोई मतलब नहीं है).

 

ज्योतिष में ऊपरवाली परिस्थिति से “छुटकारा” पाने के लिए “बगलामुखी”( मारणप्रयोग ) या “शत्रुबंधन/शत्रुनाश”  की विधि की बात आती है.
एक जैन को ये मान्य नहीं होती, यद्यपि आजकल कुछ जैन साधू भी इस प्रकार की साधनाएं करते हैं.
“जिनशासन” की सेवा करने के लिए कुछ ऐसे मंत्र उपलब्ध हैं, परन्तु मात्र अपनी रक्षा करने के लिए, दूसरे का बुरा करने के लिए नहीं, भले ही उसने हमारा बुरा किया हो.
jainmantras.com में अभी तक जितने मन्त्रों के बारे में बताया गया है, उतने ही पर्याप्त  हैं, सुखी जीवन के लिए.
“वैरं मज्झ न केणई” सूत्र बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसी का सतत जाप करने से दूसरों के साथ शत्रुता मिट जाती है.
“संगमदेव” का कुछ भी भला नहीं हो पाया, भगवान महावीर के पास छ: महीने रहने के बाद भी, क्योंकि उसने इतने महीने उन्हें भयंकर उपसर्ग दिए.
अंत में क्या हुआ?
“करुणा” के आंसू निकले भगवान महावीर की आँखों से!

 

हम भी वीर की संतान हैं.
हमारी वीरता इसी में है कि हमारे “शत्रुओं” के लिए भी हम कुछ आंसूं निकालें क्योंकि हमारे कारण वो दुर्गति में जाने  वाले हैं.
यदि ऐसा  सोच नहीं पा रहें हैं  तो कुछ आंसूं “खुद” के लिए निकालें, क्योंकि हम वीर की संतान होकर भी ऐसा नहीं सोच पा रहे.

अब बताएं – करुणा का पात्र कौन है?
बार बार याद करें – “वैरं मज्झ न केणई” का क्या अर्थ है?

(विशेष: पोस्ट को मात्र पढ़ें नहीं, दो-तीन बार पढ़कर चिंतन करें).

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