लोगस्स का कल्प (मंत्र)

कल्प उसे कहते हैं, जो इच्छित वस्तु देने में समर्थ है. जैसे कल्पवृक्ष, कल्पसूत्र, इत्यादि.
लोगस्स का कल्प (मंत्र)
ॐ ह्रीं श्रीं एम् लोगस्स उज्जोअगरे
धम्म तित्थयरे जिणे अरिहंते कित्तइस्सं
चउवीसंपिकेवली
मम मनोवांछितं
कुरु कुरु स्वाहा ||

 

विधि:
१ सफ़ेद वस्त्र
(कहीं पर भी कोई डिज़ाइन ना हो, वर्तमान में लोग ऐसी ऐसी धोती पहनने लग गए है जो दूर से लगभग “साडी” जैसी ही दिखती है).
२ सफ़ेद आसन (कॉर्नर पर भी डिज़ाइन ना हो)
३.पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें. (इसलिए ये जप भी सूर्योदय होने लगे, तब ही शुरू किया जाए).
४. पद्मासन (यदि ये संभव नहीं हो तो सुखासन (पालथी) लगाकर बैठें.
(यदि रोज ऑफिस में कुर्सी पर और घर में सोफे पर ही बैठने का होता हो, तब कुछ दिन “सुखासन” में बैठने का अभ्यास करें फिर ही मंत्र जप के लिए अपने को तैयार करें).
५. चोविशी (जिस फोटो में २४ तीर्थंकरों की फोटो हो) के फोटो के सामने दीप और सुगन्धित धूप  करें.

 

किसी भी महीने की सुदी एकम (शुक्ल पक्ष) से शुरू करके चौदह (14) दिन  में कुल 12500 (125 माला) की संख्या में जाप पूर्ण करें.
अमुक पुस्तकों में इसे संकट निवारण मंत्र कहा है, jainmantras.com इससे सहमत नहीं है.
मंत्र के अंत में “मनोवांछितं” की बात कही गयी है, इसलिए इसे मात्र संकट निवारण मंत्र कहना उचित नहीं है, यद्यपि ये संकट का निवारण करता है, इसमें शंका नहीं है.
ये मंत्र 49 अक्षरों का है. शास्त्रों में 7 शरीर की बात कही गयी है. एक शरीर को विकसित होने में 7 साल लगते हैं.
(इसीलिए जैन दीक्षा 7 वर्ष के बच्चे को ना देकर 8 वर्ष के बच्चे को दी जाती है). 49 वर्ष पूरे होने पर व्यक्ति “पक” जाता है क्योंकि उसे दुनियादारी का ज्ञान हो जाता है. परन्तु ये शाश्वत सत्य सभी के लिए नहीं है, सामान्य दृष्टिकोण से ये बात कही गयी है. ज्यादातर व्यक्ति जीवन भर तीसरे शरीर तक ही पहुँच पाते हैं. (इस विषय पर विस्तार से फिर कभी). कुछ व्यक्ति अल्प समय में ही उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं. ऐसा इसलिए संभव होता है की पूर्व जन्म में जो “प्राप्त” होना था, वो वहां से “भटक” गए थे, इसलिए उस जन्म में प्राप्त ना होकर इस जन्म में प्राप्त होता है. योग साधना भवो-भव साथ चलती है (जिस प्रकार “कर्म” चलता है).

 

मंत्र जप शुरू करने से पहले इस मंत्र का थोड़ा अभ्यास कर लें ताकि जिस समय जाप में बैठें, तब मन में चंचलता और शरीर में थकावट ना आये.

मंत्र जपने से सबसे पहले  एकदम आराम से रोज 3 नवकार गिने.
फिर मन में  अपने गुरु को प्रणाम करें.
फिर मन में अपने इष्ट देव को प्रणाम करें.
(उस समय ऐसा समझें कि वो आपके सामने उपस्थित हो गए हैं).

 

सुविधा के लिए:

पहले दिन: 1 माला गिने.
2-3  दिन : 3 माला
4-5  दिन : 5 माला
6-7 दिन : 7 माला
8-9 दिन : 9 माला
10-11 दिन : 11 माला
12 दिन : 15 माला
13 दिन: 18 माला
14 दिन : 21 माला

कुल 125 माला

 

रोज मन के भावों में उच्चता लाने का प्रयास करें. कहने का मतलब है, जो “आनंद” पहले दिन आया हो जप करने में, वो दूसरे दिन उससे अधिक आना चाहिए. यदि ऐसा कर पाये, तो मंत्र सिद्धि भी शीघ्र और ज्यादा प्रभावशाली होगी.

जप पूरे होने पर देव दर्शन, गुरु वंदन, संघ पूजा, प्रसाद बांटना और साधर्मिक भक्ति करें. यथाशक्ति जीव दया के लिए भी कार्य करें. इससे मन में विश्वास और आनंद आएगा कि साधना सफल हुई है.

साधना पूरी होने पर jainmantras.com को सूचित करें. तब उन्हें आगे क्या करना है, ये बताया जाएगा और उनका नाम भी प्रकाशित किया जाएगा.

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