ध्यान की सर्वोच्च स्थिति – भाग 1

कुछ लोग “ध्यान” करने की “विधि” बताते हैं.
कुछ लोग “ध्यान” करते हैं, विधि का उन्हें पता नहीं होता.
(जैसे किसी के प्रति ख़राब सोचना यानि दुर्ध्यान , किसी विषय को लेकर क्रोध, दु:ख  में  आर्त्त ध्यान, इत्यादि – गलत काम करने की कोई विधि नहीं होती – परन्तु कुछ लोग “बड़े सिस्टम” से गलत काम “सही” दिखे, वैसा भी करते ही हैं, अस्तु).
कुछ लोगों की शिकायत रहती है कि वो “ध्यान” नहीं कर पाते.
कइयों को तो पता भी नहीं होता कि आखिर “ध्यान” कैसे करें, क्यों करें.
कुछ लोग कई वर्षों से ध्यान कर रहे हैं, पर उन्हें क्या हासिल हुआ, इस पर उनका ध्यान नहीं है.
कुछ लोग मात्र इतना कहते हैं कि “ध्यान” से मन को “शान्ति” मिलती है.

 

पर एक सहज प्रश्न है कि “ध्यान” की सर्वोच्च स्थिति कौनसी है?

उत्तर:
शुरुआत में नए साधक को ये कहा जाता है कि “श्वास” को “देखों.”
जबकि उसे तो “सामने” पड़ी “चीज” भी वहां क्यों पड़ी है, इसका भी “चिंतन” वो नहीं कर पाता.
तो फिर “श्वास”… जो कि “दिखता” नहीं है, उसे वह कैसे “देखे?”
वो तो “श्वास” को “देखना” भी वैसे ही समझता है, जैसे कि सामने पड़ी हुई “बाल्टी” जिसमें गरम पानी भरा हुआ है और “कुछ वाष्प” (भाप) निकलती दिखाई दे रही हो, विशेषत: सर्दी के मौसम में.
खुद का “श्वास” उसे वैसा ही  दिखाई देता है, सर्दी के मौसम में.
परन्तु ये “श्वास” देखना नहीं है.

 

शंका:
तो फिर “श्वास” को “कैसे” “देखा” जाए?

समाधान:
“श्वास” देखने के मतलब है “आँखें बंद करना” फिर उस बात को “महसूस” करना कि “श्वास” जो आ रहा है, वो कहाँ से आया, शरीर के भीतर कहाँ गया और वापस निकल कर कहाँ गया.

 

शंका:
ये तो बड़ा बेतुका लगता है. “श्वास” तो अपने आप आता है और अपने आप जाता है, इसमें “देखने” की बात कौनसी हुई और देखने की बात है तो भी ऐसा करने से क्या फायदा?

उत्तर:
बच्चा जब “अ” “आ” “इ” “ई” सीखता है तो प्रश्न खड़ा नहीं करता कि इसको सीखने से क्या फायदा है?
जब “ध्यान” के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं तो “गुरु” के आगे “प्रश्न” खड़े मत करो, जो कहे वो करो.

ये “ध्यान” मात्र एक घंटे, एक दिन या एक वर्ष करने  के  लिए नहीं है.
ये “ध्यान” जीवन भर करने के लिए है, क्योंकि “परम” तक पहुंचना है.

आगे पढ़ें : ध्यान की सर्वोच्च स्थिति : भाग 2

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