आत्म-सिद्धि

1.साधना

साधना का प्रथम चरण है:
“प्रभु भक्ति” में लीन होना.
साधना का दूसरा चरण है:
“सिध्दियों” का प्राप्त होना.
साधना का अंतिम चरण है:

“आत्मा” का “आत्मा” में लीन हो जाना.

 

2.”साधना” का “तरीका”

सभी व्यक्तियों के लिए “साधना” का “तरीका”
एक सा नहीं हो सकता.
कारण?
सभी व्यक्तियों की एक सी ‘स्थिति” नहीं होती.
सभी व्यक्तियों की एक सी “रूचि” नहीं होती.

 

3.”आत्म-सिद्धि”
के सामने अन्य बड़ी से बड़ी सिध्दियां भी बहुत छोटी हैं.
कितनी और कैसी भी सिद्धि प्राप्त कर लो,
वो मात्र इसी भव तक ही साथ रहेंगी.
फिर ऐसी सिद्धियां प्राप्त करने के पीछे दौड़ना
क्या मूर्खता नहीं है?

 

4.पहला प्रश्न :
“आत्मा” शरीर में प्रवेश करता है
या “शरीर” “आत्मा” में प्रवेश करता है?

5.दूसरा प्रश्न:
“आत्मा” शरीर को छोड़ता है
या “शरीर” “आत्मा” को छोड़ता है?
उत्तर देवें.

अब बताएं:
महत्ता किसकी है?
और हम किसके पीछे दिन-रात भागते हैं?

 

6.”आत्मा” की शक्ति “अनंत” है.
पर सबसे बड़ी मुश्किल तो ये है कि
आज तक हमें अपनी ही “आत्मा” पर
“भरोसा” नहीं हुआ.

7.”आत्मा”

– ये “शब्द” युगों से बार बार सुना
पर कहीं पर “touch” भर भी नहीं हुआ.

हमें तो भरोसा ज्योतिषियों और डॉक्टरों पर है
और वास्तविकता ये है कि
“सही इलाज” इनके पास नहीं है.

 

8.”प्रभु-भक्ति” में “लीन” होने पर
ना कोई प्रार्थना, ना कोई भजन, ना कोई जाप
इस स्थिति में पहुँचने के लिए
वास्तव में “कुछ” भी नहीं करना पड़ता.
हम व्यर्थ ही “इनको” ढोते हैं.

“ढोना” शब्द का प्रयोग इसलिए
कि आज तक ये जो जो किया,
उनके अनुपात (comparison) में
“प्राप्ति” (achievement)
कुछ भी नहीं हुई.

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