माता और पुत्र

 

माता और पुत्र 

एक गुरूजी ने आदेश दिया है कि
मैं “माता पदमावती” पर कुछ लिखूं.

“माता” पर “पुत्र” क्या लिखेगा?
पुत्र जब माता के पास हो तो माता को कुछ और नहीं चाहिए
जबकि पुत्र को तो “माता” भी चाहिए और “जो मन करे” वो भी चाहिए.

पुत्र तो जो चाहे “कह” देगा
पर “माता” तो खुद पुत्र की इच्छा भी जानती है.
और उसके लिए क्या सही है, क्या गलत,
ये भी जानती है.

इसलिए जो काम नहीं हो रहा है,
मतलब वो काम करने की माता की “मनाही” है.
( इस बात को स्वीकार कर लो – सदा के लिए )

माता तो स्वयं हाज़िर ही है

परंतु हम तो उन्हें “मूर्ति” मानते हैं.
जबकि उन्हें “चुंदरी” भी “चढ़ाते” हैं.

अपनी माँ के लिए कभी “साड़ी” लाये हैं?
ये सवाल “सभी पुत्रों” से है.

यदि इसका उत्तर हाँ है,
तो “माँ” पद्मावती भी आप पर प्रसन्न ही है,
कोई साधना करने की जरूरत नहीं है.
(मात्र रोज प्रणाम किया करें).

यदि इसका उत्तर ना है,
तो कुछ देर “अपनी माँ” के साथ बैठकर “रो” लो.
( विश्वास करना – माँ तुम्हें और “रोने” नहीं देगी).

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